Thursday, August 31, 2023

मेघ...

महीनो बैठे राह देखि पर

आ आ के लौट गए सितमगर

बूँद दो बूँद बरसाके जैसे

छेड़ जाते धरती को बर्बर


कड़ी तपती धूप थी सर पर

अधर भी रहते सूख सूख कर

हाथ ये जल छूने को तरसे

मिट्टी भी सोई आँख मूँद कर


सूर्य को थोड़ी छुट्टी देकर

गरजते घने से बादल लेकर

नयन ये ऊपर उठकर पूछे

कब बरसोगे इन्द्र ज़मीन पर?


अब लगता है अर्जी सुनकर

दरिया से पानी ये भरकर

टूट पड़े हो जम के जैसे

आज बरसे है मेघ मेरे घर


भभकते ताप को शीतल करके

जड़ भूमि को अमृत देके

आया सावन झमाझम ऐसे

हवा में सौंधी खुशबू भरके


बिजली से अंधेर आसमान चमके

मन नाचे है गर्जन सुनके

आशा है ये रात भर बरसे

और न तड़पाये रह रह के..


लगेंगे घरों में ढेर कपड़ो के

भरेंगे बच्चों के गड्ढे पानी के

अब चाय संग पकोड़े परोसे

अब इतरायेंगी छतरियाँ खुल के


सारा सावन सूखा बिताके

अब न जाना बस मुँह ही दिखाके

देर से आये तो जाए देर से

विदा लेना बस इतना जानके


मानव, पशु, पंखी, दरख्ते

और न धरती रहे तरसके

तुम बिन जीवन निखरे कैसे

तुम ही तो रक्त हो प्रकृति के..


Sapna..