Monday, January 30, 2023

भिखारी...

 एक वक़्त था जब मैं आपसे घंटो बातें किया करती

उन इधर-उधर की बातों में वक़्त का पता ही नहीं चलता

अब जो वैसा कुछ हो नहीं सकता

मैं अपने आपको किसी भिखारी सी लगती हूँ

मेरे लिए कटोरा मेरा फ़ोन है

जिसमे आपसे बात करने का मौका, सिक्को जैसा है

आपकी आवाज़ उन सिक्को की खनक सी है


इस उम्मीद में की कोई तो मुझसे बात करेगा

मैं फ़ोन लगाना शुरू करती हूँ

पर कोई मुझसे कुछ मिनटो से ज़्यादा बात नहीं करता


शायद उन्हें मेरी उस तरह याद नहीं आती,

जिस तरह आपको आती थी

शायद किसीको मेरी बातें सुनने में,

वो आनंद ना आया जो आपको आता था

शायद उन्हें मुझसे वो लगाव नहीं,

जो आपको मुझसे था.


ये 'था' लिखने में तो बड़ा आसान है

मगर इसे मानना, विश्वास करना बड़ा मुश्किल

ना जाने कब मैं इस 'था' को अपनाऊँ

फिलहाल तो मैं एक हताश, निराश भिखारी जैसे

बस अपने फ़ोन को घूरा करती हूँ...


Sapna..

Thursday, January 26, 2023

फेर बदल

खिड़की पर खड़े हुए मैंने एक दृश्य देखा

एक छोटा बच्चा अपनी माँ की ऊँगली थामे चल रहा था

और ठीक सामने से एक आदमी अपने फ़ोन में मगन जा रहा था


दोनों एक दुसरे के सामने से गुज़रे

ना बच्चे ने आदमी को देखा

ना उस आदमी ने बच्चे को


कुछ सालों बाद ये भूमिकाएं उलट जायेगी

जब बच्चा बड़ा होकर फ़ोन में मगन रहेगा

और वह आदमी किसी बच्चे को देखके खुश हुआ करेगा


इस फेर बदल के अंतराल में कितना कुछ बीत चूका होगा

कितना कुछ पाया होगा, कितना कुछ खोया होगा,

फिर कुछ समय बाद वह बच्चा जो आदमी बना,

वह भी किसी बच्चे में ही अपनी ख़ुशी पायेगा

और ये चलता ही जाएगा


Sapna...


तेरी शॉल...

उसमे तेरे हाथों की नर्माहट है

उसमे तेरे प्यार की गर्माहट है

कभी तू इसे ओढ़ा करती थी ठण्ड से बचने

अब मैं इसे ओढ़ती हूँ, तुझसे लिपटने


इसे ओढ़के लगता है तेरे गले लगी हूँ

लेटू तो लगता है तेरी गोद में सोई हूँ

ये अंदर अलग, बाहर अलग सी दिखती है

ठीक तेरी तरह -

तू बहार से गुस्सा, अंदर से प्यार जो करती है


इसे ओढ़े रहना एक सुकून का एहसास है

इसे अपने पास रखना मेरे लिए ख़ास है

तेरी हर चीज़ में मैं तुझे खोजती हूँ - पाती हूँ

तेरी शॉल, साड़ियां, गहने देख देख कर

तेरी यादों में ढेर सारा वक़्त बिताती हूँ


Sapna...

तस्वीर...

एक महीने पहले

आपकी एक तस्वीर खींची थी मैंने

आप लाल साड़ी में

मंदिर के बहार खड़ी थी

आपने मना किया

पर मेरी ज़िद के आगे हार के

आप खड़े होकर मुस्कुराई

और मैंने आपकी तसवीर ले ली.


अब वो तस्वीर मेरे फ़ोन पे

आपकी आखरी तस्वीर बन के बैठी है

अब शायद वैसे ही किसी मंदिर के अंदर

भगवान के पास और हमारी यादों में

उसी लाल साड़ी में

सबसे खूबसूरत देवी बन के बैठी है...


Sapna...

Wednesday, January 25, 2023

25 जनवरी..

25 जनवरी

ये तारीख अब कुछ अच्छी नहीं लगती


कल सारी रात करवटो में बीती

दिल चाहता था की कल हो ही ना

या फिर जब सुबह आँख खुले

तो 25 नहीं 26 तारीख हो


हर साल इस दिन के लिए इंतज़ार होता

एक एक दिन नज़दीक आने का उत्साह होता

एक उम्मीद सी लहर होती

ढेर सारे प्यार की आशा होती


आज प्यार बरसानेवाला परिवार होते हुए भी

इन आँखों में ना सूखने वाली नमी है

क्युकी गुज़रे सालों की जगह आनेवाले सालों में

अब से हमेशा के लिए, तेरी बधाई की कमी है


खिलखिला कर ख़ुशी से तेरा फ़ोन करना,

'हैप्पी बर्थडे सा' के साथ ढेर सारा आशीष देना,

जमाई सा कहा ले जाएंगे? ये खबर लेना,

क्या तोहफा चाहिए? ये पूछते जाना,

और दिन ख़तम होने से पहले घर आने की बात मनवाना


अब तेरी तरह ज़िद्द कौन किया करेगा?

कौन हमारे लिए जग से लड़ेगा?

कौन हमारी अटूट ढाल बनेगा?

कौन छोटी-छोटी खुशियों में जियेगा?

कौन हमारे बच्चों को लाड से बिगाड़ेगा?

कौन हुमारे सवालों के जवाब देगा?

कौन अब इस खलीपन को भरेगा?...


तो बस अब जी चाहता है

की 25 जनवरी ना आया करे

आंसुओं में भीगी तेरी याद ना दिलाया करे..


अब मन की आस है कि

तेरी मुस्कराहट से हमें हिम्मत मिलती रहे,

तेरी तस्वीर तेरे होने का एहसास दिलाया करे...


Sapna.. 

Saturday, January 21, 2023

कमी, गुस्सा और पछतावा...

 माँ, 

तू क्या गई,

अपनी कमी के साथ गुस्सा और पछतावा दे गई


पछतावा इस बात का की तूने बचपन में मुझे खुदसे अलग क्यों किया 

पछतावा इस बात का की कई साल मैंने तुझे माँ क्यों ना बुलाया


पछतावा ये की तेरे बुलाने पे मैं तेरे पास क्यों ना रुकी

पछतावा ये की तेरी हो कर भी मैं तेरी बेटी ना हो सकी


पछतावा इस बात का की तूने मेरा बचपन जिया ही नहीं

रूठना- मानना ये हम दोनों ने कभी किया ही नहीं


पछतावा ये की मैं बेटी क्यों बनी

ससुराल आकर तुझसे फिर से अलग क्यों हुई


पछतावा ये तुझे और क्यों ना घुमाया

तेरी ज़िंदादिली देखने का लुत्फ़ क्यों ना उठाया 


गुस्सा इस बात का की हमने लापरवाही क्यों की

गुस्सा इस बात का की तुझे और वक़्त मिला क्यों नहीं...


गुस्सा इस बात का की कुदरत ने हमें इशारा क्यों ना दिया? 

गुस्सा इस बात का की तूने अपने ही परिवार को दुखी कैसे छोड़ दिया?


तब तेरी कमी लगती थी तो फ़ोन पे बात हुआ करती थी

अब तेरी कमी जैसे किश्तों में जान लिया करती है


ये कमी, ये गुस्सा, ये तकलीफ, ये पछतावा

अब बचा क्या हमारे पास इसके अलावा?


माँ,

कैसे जिया जाए तेरे बिन ये भी सिखा देती

ताकि तेरे बाद जीने में कुछ मदद ही मिल जाती...



Sapna...