आज अकेले बैठे हुए
अपने हाथों पर नज़र पड़ी
कुछ रूखे से लगे मुझे
गौर से देखा और पता चला
की ये रूखापन सर्द मौसम का नहीं
ये तो महीन झुर्रियां है
एकाएक माँ के हाथों की याद आ गई
उनके हाथ कभी ऐसे ही हुआ करते थे
पर मुझसे कही ज़्यादा नरम
कई ज़्यादा काम किये हुए
कई ज़्यादा आंसू पोंछे हुए
कई ज़्यादा हिम्मत देते हुए
फिर ख्याल आया की ये झुर्रियाँ
बड़ी जल्दी दिखने लगी
अभी तो बहुत सारा काम है
छुट्टियाँ होनेवाली है,
एक बार पीहर जाना बाकी है
बहनो संग गप्पे लड़ाना,
जीजाजी संग आइस क्रीम खाना बाकी है
भाई भाभी संग घूमना,
पापा से बातें करना बाकी है
माँ को गए एक साल हो गया
पर अभी उनकी तस्वीर से बातें बाकी है
बच्चों संग यादें बनाना,
उन्हें आत्मा निर्भर बनाना बाकी ही
इनके साथ गाने सुनना,
कई और यादें बनाना बाकी है
अरे दोस्तों से अरसे से कहा मिली
उनके साथ सुख दुःख बाँटना बाकी है
फिर ख्याल आया की ये महज झुर्रियां है
समय समाप्ति का इशारा नहीं
पर बाकी काम और अधूरे सपने
अब टालने नहीं है
शुक्रिया झुर्रियों..
बस तुम एक वादा करना,
चाहे शरीर पर कितनी ही पड़ो
कभी रिश्तों पर तुम्हारी नज़र ना हो...
Sapna..