Thursday, February 8, 2024

झुर्रियाँ...

आज अकेले बैठे हुए

अपने हाथों पर नज़र पड़ी

कुछ रूखे से लगे मुझे

गौर से देखा और पता चला

की ये रूखापन सर्द मौसम का नहीं 

ये तो महीन झुर्रियां है


एकाएक माँ के हाथों की याद आ गई

उनके हाथ कभी ऐसे ही हुआ करते थे 

पर मुझसे कही ज़्यादा नरम

कई ज़्यादा काम किये हुए

कई ज़्यादा आंसू पोंछे हुए

कई ज़्यादा हिम्मत देते हुए


फिर ख्याल आया की ये झुर्रियाँ

बड़ी जल्दी दिखने लगी

अभी तो बहुत सारा काम है


छुट्टियाँ होनेवाली है,

एक बार पीहर जाना बाकी है

बहनो संग गप्पे लड़ाना,

जीजाजी संग आइस क्रीम खाना बाकी है

भाई भाभी संग घूमना,

पापा से बातें करना बाकी है

माँ को गए एक साल हो गया

पर अभी उनकी तस्वीर से बातें बाकी है 


बच्चों संग यादें बनाना,

उन्हें आत्मा निर्भर बनाना बाकी ही

इनके साथ गाने सुनना,

कई और यादें बनाना बाकी है

अरे दोस्तों से अरसे से कहा मिली

उनके साथ सुख दुःख बाँटना बाकी है


फिर ख्याल आया की ये महज झुर्रियां है

समय समाप्ति का इशारा नहीं

पर बाकी काम और अधूरे सपने

अब टालने नहीं है


शुक्रिया झुर्रियों..

बस तुम एक वादा करना,

चाहे शरीर पर कितनी ही पड़ो

कभी रिश्तों पर तुम्हारी नज़र ना हो...

Sapna..


किताबों के शहर...

आज घूमने निकली हूँ मैं

किताबों के शहर

कविताओं के यहाँ पुल है

कल्पनाओं से है घर


शब्दों के ऊँचे पहाड़ों के बीच से 

बह रही विचारों की नहर

रंग- बिरंगे, उदास और खुशमिज़ाज

उसमे समाये ऐसे कई पत्थर


बहती रही वो बलखाती हुई

मोड़ और रुकावट की उसे क्या फ़िकर 

चली मैं उसके पीछे पीछे

पहुंची रचनाओं के समंदर


बिखरे है कई शब्द किनारे पे

भावनाओं से भरी हर लहर

गोते लगाए जब विशालता में

पड़ी एक नए अस्तित्व पर नज़र 


इसी तरह गुज़रे रातें मेरी

यही शुरू हो हर एक सहर

खोलू मन की खिड़की जब भी

सामने हो कहानियों का महासागर!!


Sapna..

Friday, February 2, 2024

मेरे सफ़ेद बाल...

कई दिनों से दिल में है ये खयाल

कि रंगवालु अपने नए नए सफ़ेद बाल


जब जब आईने में खुदको देखा

तो खुदको जैसे औरों की नज़रों से देखा


की अभी तो तुम जवान हो

फिर सर पे ये सफ़ेद बालों का क्या काम?

बूढी, आंटी, माजिया, बुजुर्ग

ना जाने दिया जाएगा मुझे कौनसा नाम!


तुम हमसे छोटी हो, हम से कुछ सीखो

बाल रंगवालो और हम जैसे tip-top दिखो

कानों में ये आवाज़ें जैसे गूँजने लगी

क्या करू कुछ समझ आया नहीं


दिल कहता की ऐसी ही रह जाऊ

दिमाग कहता की मैं टिपण्णी ना सुन पाऊ


फिर जब नज़र अपनी ही आँखों पे पड़ी

उनमे देखि मैंने खुदकी दमकती हुई छवि

वो नज़रें मुझे कुछ बताने लगी

अपनी ही एहमियत जताने लगी


तुम्हारे ये जो सफ़ेद बाल है

वो महज़ उम्र बढ़ने की निशानी है

ना इनसे तुम्हारा वजूद बदलेगा, ना व्यवहार

ना इनसे तुम्हारा हुनर घटेगा, ना अपनों का प्यार

फिर क्यों सहना बेवजह अपेक्षाओं का भार?

आलोचनायें तो होती ही है अपार..


बचपन से बस बढ़ना ही तो कायम है 

अब कहाँ तुम्हारी त्वचा वैसी मुलायम है?

कद बढ़ा तब तो किसीने शिकायत ना की

रूप में भी तो तुम सुन्दर होती गई

जूतों को लेके भी तो होता है बवाल

10 नंबर के ढूंढने में हो जाता है बुरा हाल ...


अब चमकने लगे है उम्र से ये बाल

तो इन्हे अपनाने में इतने सारे सवाल?

ये शंकाएं तुम्हारी नहीं, विज्ञापको की दी है

ऐसे ही तो बढ़ती उनको बिक्री है...

ठीक है रंगवालो इन्हे काले, लाल या भूरे

कुछ दिनों में फिर ऐसे ही दिखेंगे पूरे


मेरी मानों जैसी हो, वैसी ही रह जाओ

पैसे बचाओ, बालों का कुदरती सत्त्व भी

बिना शर्त खुद से प्रेम कर पाओ

यही तो है जीने का सही तत्त्व भी..


आँखों की बातें सुनके, आया ये ख़याल

ख़ामख़ा क्यों मिलाऊ मैं दुनिया ताल से ताल 

जिसको जैसे करने है, करे वैसे सवाल

अब नहीं रंगवाउंगी मैं अपने सफ़ेद बाल!!


Sapna..