Tuesday, April 16, 2024

शारीरिक रूह...

मेरी रूह शारीरिक है

मैं उसे महज़ महसूस नहीं कर सकती 

बल्कि

उसे छू सकती हूँ 


वह मुझे कभी

कभी अत्यंत सराहनीय लगती है

और कभी

मैं उसे मिटा देना चाहती हूँ


मेरा लेखन

मेरे शरीर कि रूह सा है

वह मेरे अंत के बाद

कही भटकेगी नहीं

वह मेरी किताब में

छुपी बैठी मिलेगा


किताब के खुलते ही

जैसे शब्द रिहा होते है

मेरे लिखे में

मेरी रूह आज़ाद उड़ती रहेगी

Monday, April 15, 2024

सैलाब

 अस्तित्व के किनारे पर 

अच्छी - बुरी आदतें 

कभी निडर, कभी घबराए 

हंसती - रोती बातों किया करती है


लम्हे महीन रेत से 

यहाँ वहाँ खेलते कूदते रहते है


कुछ खुशियों की लहरें

दुःख को धो देती है

तो कुछ उम्मीदें ऊंची ऊंची 

हिलोरे लगा लिया करती है


जीवन बस इन सबमें

गोते लगाने में व्यस्त रहता

और मौत एक सैलाब सा

सारा सही और गलत बहा ले जाती है

Sunday, April 14, 2024

अँधेरी सुबह

सारा घर भरा हुआ था

उसके आने के इंतज़ार में

अनदेखा सा माहौल था 

हलचल सी थी परिवार में


कुछ लम्हे थम से गए थे

कुछ बिखरे थे आँगन में कही

कई किस्से किसीको याद से आते

कही यादें दिलों में दस्तक देती


वो आई जिसके लिए पलके थी बिछी

उसके होने पर हर नज़र खींची चली


लाल लहंगा, गोटेदार चूनर

आँखों में काजल, माथे पे बिंदी 

होठों पे लाली, हथेली पे मेहेंदी

माथे पे बोर, हाथों में चूड़ी

सुंदरता में कसार न रही कोई


बहन, भाभी और लड़कियाँ

उसे सबने मिलके सजाया

सामने आए पतिदेव, भरी उसकी मांग

और बच्चों ने ओढ़ाई उसे, उसकी पसंदीदा शॉल

उठाए उसे बड़े नाज़ों से

लेकर निकले देहलीज़ के पार

कंधे थे वही चार

लेकिन वो थी नई यात्रा के लिए सवार


भोर वो औरों के लिए उजाली रही होगी

उसके परिवार की आज अँधेरी सुबह थी

जब भाई, बेहेन अपनी बेहेन को

जब उसके पति, अपनी संगिनी को

उसके बच्चे अपनी माँ को

उसके नवासे और पोती अपनी नानी/दादी को

और आए हुए लोग, एक बेहद भले इंसान को

अलविदा कहने इकठ्ठा हुए थे

Saturday, April 13, 2024

मैं और मेरा लिखना..

मैं और मेरा लिखना

आँख मिचोली खेलते है एक दुसरे से


जब वो मेरे पास आए तो मैं व्यस्त होती हूँ

जब मैं उसे ढूँढू वो कही छुप जाता है


जब कोई ख़याल मन में आता है

शब्द मेरे गुम हो जाते है


कोई पंक्तियाँ मन सोच पाता है

हाथों को लिखने का वक़्त नहीं मिल पाता है


इत्मिनान से लिखने बेठू कभी

तो ख्याल छोटे बच्चो से उथल पुथल मचाते है


अपने लेखन को टटोलने लगती हूँ

तो वो मुझसे रूठ सा जाता है 

मिन्नतें करू पर वो मुँह चढ़ाए उकडू बैठ जाता है

उसे मानाने की कोशिश नाकाम होते देख 

"फिर तुझे कभी नहीं टालूंगी" का झूठा वादा करना पड़ता है


मुस्कुराकर वो मुझसे लिपट जाता है

फिर हम दोनों शब्दों की डोर से बंधे

ख़ुशी के गुब्बारे में साथ साथ उड़ जाते है..


Sapna..

Wednesday, April 10, 2024

स्वरूप..

 सुबह सबसे पहले उठके

सबका पेट भरने की व्यवस्था करती

कपडे धो, सूखा के तह करती, बर्तन चमकाती

पराये घर को अपना समझ सुन्दर बनाती


बड़े स्नेह से बच्चों को जगा कर तैयार करती

पति की थाली में गरम नास्ता परोसती है

वो काम पे जाता और बच्चे स्कूल 

फिर वो अपने बाकी कामों में लग जाती


बिना शिकायत जब तक काम करती

सबको भली लगती, बड़ी सुहाती

अपनेआप को जब एहमियत देने लगती

कभी खुदगर्ज़, कभी बेशरम कहलाती


पति की कठोरता, बच्चो की अज्ञानता

"नसीब है मेरा" समझ के जीती

निगलती तठस्थता के निवाले

अपमान के वो घुट पी लेती


इंसान के रूप में जन्मी तो थी

पर ये बात वो क्यों नहीं समझती

की जो हाथ थामे उसे हाथ उठाने का हक़ नहीं

जिसे जनम दिया उनका नाशुक्रा होना ठीक नहीं

 

बेजान सी होकर जैसे दिन गुज़ारती

रोज़ अपने अस्तित्व की हत्या कर देती

ना किसीसे सवाल न अपेक्षा रखती

सबके सुख की चाह हमेशा करती 


कौन है ये? 

कहा रहती है?

वो जो सबकी खशी चाह के

खुद हमेशा दुःख सहती है 

कहा से लाती है वो ये

त्याग, निस्वार्थता और आत्मबल?

कैसे रहके मूक, मर मर जीती हर पल?


उस मन की सुंदरता के आगे

ये मतलबी, लालची दुनिया कुरूप है

वो ना केवल पत्नी है,

ना बहू और ना तुम्हारे बच्चों की माँ

नारी के रूप में

वो शक्ति का स्वरूप है..


Sapna