सुबह सबसे पहले उठके
सबका पेट भरने की व्यवस्था करती
कपडे धो, सूखा के तह करती, बर्तन चमकाती
पराये घर को अपना समझ सुन्दर बनाती
बड़े स्नेह से बच्चों को जगा कर तैयार करती
पति की थाली में गरम नास्ता परोसती है
वो काम पे जाता और बच्चे स्कूल
फिर वो अपने बाकी कामों में लग जाती
बिना शिकायत जब तक काम करती
सबको भली लगती, बड़ी सुहाती
अपनेआप को जब एहमियत देने लगती
कभी खुदगर्ज़, कभी बेशरम कहलाती
पति की कठोरता, बच्चो की अज्ञानता
"नसीब है मेरा" समझ के जीती
निगलती तठस्थता के निवाले
अपमान के वो घुट पी लेती
इंसान के रूप में जन्मी तो थी
पर ये बात वो क्यों नहीं समझती
की जो हाथ थामे उसे हाथ उठाने का हक़ नहीं
जिसे जनम दिया उनका नाशुक्रा होना ठीक नहीं
बेजान सी होकर जैसे दिन गुज़ारती
रोज़ अपने अस्तित्व की हत्या कर देती
ना किसीसे सवाल न अपेक्षा रखती
सबके सुख की चाह हमेशा करती
कौन है ये?
कहा रहती है?
वो जो सबकी खशी चाह के
खुद हमेशा दुःख सहती है
कहा से लाती है वो ये
त्याग, निस्वार्थता और आत्मबल?
कैसे रहके मूक, मर मर जीती हर पल?
उस मन की सुंदरता के आगे
ये मतलबी, लालची दुनिया कुरूप है
वो ना केवल पत्नी है,
ना बहू और ना तुम्हारे बच्चों की माँ
नारी के रूप में
वो शक्ति का स्वरूप है..
Sapna