Thursday, August 31, 2023

मेघ...

महीनो बैठे राह देखि पर

आ आ के लौट गए सितमगर

बूँद दो बूँद बरसाके जैसे

छेड़ जाते धरती को बर्बर


कड़ी तपती धूप थी सर पर

अधर भी रहते सूख सूख कर

हाथ ये जल छूने को तरसे

मिट्टी भी सोई आँख मूँद कर


सूर्य को थोड़ी छुट्टी देकर

गरजते घने से बादल लेकर

नयन ये ऊपर उठकर पूछे

कब बरसोगे इन्द्र ज़मीन पर?


अब लगता है अर्जी सुनकर

दरिया से पानी ये भरकर

टूट पड़े हो जम के जैसे

आज बरसे है मेघ मेरे घर


भभकते ताप को शीतल करके

जड़ भूमि को अमृत देके

आया सावन झमाझम ऐसे

हवा में सौंधी खुशबू भरके


बिजली से अंधेर आसमान चमके

मन नाचे है गर्जन सुनके

आशा है ये रात भर बरसे

और न तड़पाये रह रह के..


लगेंगे घरों में ढेर कपड़ो के

भरेंगे बच्चों के गड्ढे पानी के

अब चाय संग पकोड़े परोसे

अब इतरायेंगी छतरियाँ खुल के


सारा सावन सूखा बिताके

अब न जाना बस मुँह ही दिखाके

देर से आये तो जाए देर से

विदा लेना बस इतना जानके


मानव, पशु, पंखी, दरख्ते

और न धरती रहे तरसके

तुम बिन जीवन निखरे कैसे

तुम ही तो रक्त हो प्रकृति के..


Sapna..

Tuesday, July 11, 2023

अब भी..

कानो में आवाज़ अब भी गूंजती है तुम्हारी..

जब तुम मुझे दिलासा दिया करती

जब 'ऐसे नहीं रोया करते बेटा' ये कहा करती

जब 'घर कब आओगी?' ये पूछती


आँखों में वो पल अब भी कैद से है..

जब तुम चाय की चुस्किया लिया करती

जब मेरे आने पे खुश हुआ करती

जब पापा को छेड़ा करती


तुम्हारे हाथों की छुअन अब भी मौजूद सी है..

जब तुम हमें आशीर्वाद दिया करती

जब बच्चो से जी भर के लाड लड़ाती

जब प्यार से बालों को सहलाती


स्वाद अब भी तुम्हारे हाथों का, याद सा है..

जब सर्दियों में बादाम का दूध बनाती

जब ख़ास हमारे लिए उड़द चक्की बनाती

जब ढेर सारे घी वाला सीरा बनाती


रंग वो अब भी ताज़ा से है..

जब तुम होली पे रंग लगाती

जब त्योहारों पे नए कपड़ो में सजती

जब अपनी अलमारी की साड़ियां दिखाती


उमंग वो अब भी बिखरी सी है..

जब कही बाहर घूमने को जाते

जब कोई मेहमान घर में आते

जब तुम ढोल की आवाज़ पे नाचती


नहीं है तो बस एक चीज़..

तुम्हारे बिना जीने का तजुर्बा

की वो कभी हमें आया ही नहीं

तुम्हे खुदसे दूर कभी पाया ही नहीं..


Sapna..

गलती हो गई...

गलती हो गई..


.. की कभी आपको शुक्रिया ना किया,

भी ढेर सारा प्यार नहीं जताया,

आप कितनी ज़रूरी हो, ये न बताया


.. जिस तरह परवरिश की हमारी

कभी आपका क़र्ज़ अदा ना किया,

कभी उसका ज़िक्र तक न किया


.. ये सोचा की बहुत वक़्त है,

कुछ चीज़ें कभी और कर लेंगे

कल करना था, सो आज न किया


.. की आपकी छोटी सी तकलीफ

हमने अनदेखी कर दी,

आप कही ना जाओगे, ये मान लिया


.. की ज़िन्दगी की सच्चाई को न समझा,

नानी के जाने के बाद खुदको आपने

कैसे संभाला, ये न पूछा..


.. इन गलतियों को कैसे सुधारें?

कैसे ये जाने की आपने

हमें माफ़ कर दिया?


इस कशमकश में दिन कटते है,

की हमें इतना प्यार करते हुए भी

आपने हमें कैसे छोड़ दिया?


Sapna..

Sunday, June 4, 2023

Little birdies...

 You were cute little hatchlings,

Cooing in are arms.

You made our childhood worthwhile,

Keeping us busy with your charms.


Taking baby steps, learning to walk,

Tumbling, falling and getting up.

Blurting out words, learning to talk,

Gurgling, mumbling, trying to speak up.


We almost grew together parallelly,

Owing to proximity of our ages.

Fighting our little battles bravely,

Rebelling and breaking through our cages.


You have been through them all,

Thunder, stormy, hot and rainy days.

And we stood there watching you,

Outgrowing yourselves in many ways.


Babies to children to youngsters,

Now smart, sensitive and fun young men.

Owning your lives, living your terms,

Taking us through happy days now and then.


And now we stand there, 

Looking at you again.

Chirping with your new little birdies,

The feeling is insane.


Happiness, pride, disbelief and love,

How do we explain? Words fall short.

May divine blessings be showered from above,

You know always have our support.


So much to wish, so much to say,

May you conquer the explorables.

Strengthening your bonds night and day,

Stay chirpy you crazy adorables.




















Thursday, April 20, 2023

राह दिखाओ...

 आप सोचती होंगी,

कि बड़ी खुदगर्ज़ हो गई हूँ.

मैं आज कल

आपकी तस्वीर से ही बातें करती हूँ,

और चाहती हूँ

की आप सिर्फ सुने नहीं,

जवाब भी दे.

बड़ी बेशरम भी हो गई हूँ शायद

जो कुदरत के किए को

चुनौती देने चली हूँ..


पर मैं करू भी क्या माँ..?

कुछ शूल इतने ज़्यादा चुभ रहे है

कि उनका मरहम

शायद सिर्फ आपके पास है,

या आपके पास था...


कहते है सब,

कि दिल से कोशिश करेंगे तो

आपको महसूस कर सकेंगे

मैं नहीं जानती ये कैसे होगा,

बस चाहती हूँ को अब हो जाए..


क्यूँकी मैं आपसे अपने सवालों का

जवाब नहीं चाहती.

मैं आपके ज़रिए, आज़ादी चाहती हूँ

इन बेरुखियों से, इस व्यवहार से

इस जड़ता से, इस हृदयहीनता से

और इस कभी ना ख़तम होने वाली घुटन से..


मैं नही जानती

कि इन सब से नवाज़े जाने के लिए

मैंने क्या कर दिया है.

पर आपकी सीख पे कभी आंच तो नहीं आने दी.

ना कभी किसीका बुरा चाहा, ना किया

अपने से आगे हमेशा दूसरो को रखा


पर माँ.. आपने मुझे ये क्यों नहीं समझा दिया

कि ये सब सिर्फ उनके लिए करना चाहिए

जो इसके हक़दार हो.

जिन्हे अपनेपन और प्यार के मायने

समझ ही नहीं आते,

उन जड़बुद्धियो के लिए नहीं..


जो हमें हमारे हक़ का मान न दे पाए,

उन्हें हम सर पर क्यों बिठाये रखे?

जिनके लिए हम उनकी दुनिया का हिस्सा भी नहीं,

उन्हें हम अपना सब कुछ कैसे मानते चले??


अब तक सिर्फ आपकी हस्ती तस्वीर देखके

मैंने बहुत हिम्मत बटोर तो ली है,

पर अब शायद उसका भंडार भी

क्षीण होता सा मालूम होता है.

तो इससे पहले कि ये घुटन

मेरी सीख का दम घोट दे,

मुझे राह दिखाओ माँ....


आपकी प्यारी 

Sapna..

Monday, April 10, 2023

मेरा पुराना घर...

4 मंज़िलों पर बड़ी सी छत

उस घर में अपना बचपन देखा है

4 परिवार वहाँ मिलकर रहते

उसमे 4 भाइयों की मेहनत को देखा है


19 भाई बहन थे हम

16 साल के अंतराल में

झगड़ते, लड़ते, ख़ुशी मनाते

उस घर ने हमे हर हाल में देखा है


ऊपर निचे खिड़कियों से

ज़ोर ज़ोर से बातें होते देखा है

बनी नई dish का कोई मिठाई

हर एक के घर में पहुंचते देखा है


बारिश के दिनों में छत भर जाता

बहनो को सीढ़ियों से पानी ढकेलते देखा है

अँधेरी, बिन रौशनी की रातों में

अंताक्षरी का खेल होते देखा है


पढ़ाने आते जब मास्टर जी

बेचारे उनकी ही नहीं चलती

कभी मेज की जगह बालटी

कभी बत्ती होती गुल

जन्मदिन पर छुट्टी लेने

उन्हें गुलाब जामुन खिलाते देखा है


क्रिकेट भाइयों का खेल

बहनें को गप्पों में चुस्त देखा

एक दुसरे के कई कई राज़

बड़ों से गुप्त रखते देखा है


होली पे सब साथ ही रंगते

दिवाली में दिए जलाते

छत्तों पर मिलकर पतंग उड़ाते

नया साल ज़ोरों से मनाते देखा है


त्योहारों, अवसरों की तैयारी

माएँ हमारी रसोई में करती

कौन क्या पेहेनने वाला है

लड़कियों को बातें करते देखा है


छुट्टियों में घर जैसे गूंजता था

नए नए खेलों की होती खोज

शरारतों से भरी मस्ती में भी

माँ बाप की इज़्ज़त करते देखा है


लट्टू, कंचे मिलकर खेले

भाड़े पे लाई साइकिल की ख़ुशी

4 आने 8 आने की गोलियों पे

सबका जी ललचाते देखा है


बहार जाने की अनुमति के लिए

एक दुसरे का नाम लिया करते

देर से आके, डाँट से बचने

छुप छुप के, जूते हाथों में लाते देखा है


भाइयों में जैसे दोस्त मिले

बहनो में सहेली और हमराज़

एक दुसरे के साथ से ही

हर काम को पूरे होते देखा है


एक दुसरे के अजीब नाम रखते

बड़ो को हमें परखते देखा है

नए नए रिश्तो की उमंगो में

पुराने रिश्तों को निखारते देखा है   


शादियों की तो धूम अलग थी

खाने का मेनू बनता कही

कही कपड़ो की shopping होती

कही तोहफों की packing होती

संगीत की practise करते करते

नई ज़िन्दगी के सपनो को बुनते देखा है


नई भाभी का प्यार मिला

जीजू के साथ पहली होली

नन्हे मुन्नों को लाड लडाना

उनकी बोली दिल को लुभाते देखा है


बेटियों की बिदाई होते

नई बहुओं को घर आते

बेटे होने लगे पैरों पर खड़े

नई पीढ़ी को होशियार होते देखा है


घर बदले, गाड़ियां बदली

पर उस घर में मैंने अब भी अपनापन देखा है

हर याद को संजोए रखा है

मेरे पुराने घर ने मेरे साथ

एक ज़माना गुज़रते देखा है


Sapna..

Wednesday, March 29, 2023

चक्रव्यूह..

सवालों का घेरा सा होता है मन के आस पास..

कुछ सवाल ऐसे जिनके जवाब है,

पर वो हमें मान्य नहीं

कुछ सवाल ऐसे जो खुद ही मान्य नहीं

कुछ सवाल जो हम खुदसे पूछा करती हूँ

कुछ सवाल जो सिर्फ आँखें में होते है

कुछ सवालों के कई जवाब होते है

कुछ के जवाब होते ही नहीं

कुछ सवाल ऐसे जिन्हे पूछने से डर लगता है

कुछ सवाल ऐसे जो निडर उमड़ पड़ते है

कुछ सवाल ऐसे जो बासी हो चुके है

कुछ सवाल जो वक़्त में कही खो चुके है

 

ये हाल सिर्फ मेरा नहीं, 

हर एक मन का है...

कुछ सवालों के जवाब तुरंत मिल जाते है

कुछ के लिए ऊपरवाला वक़्त लगाता है

कुछ जवाब आराम देते है

कुछ तकलीफें बढ़ा देते है

कुछ जवाब हमें कैद करते जाते है

कुछ रिहाई की ओरे ले जाते है  

कुछ जवाब सस्ते दामों में बिकते है

कुछ ज़िन्दगी से भी मेहेंगे होते है

कुछ सवालों के जवाब कभी मिलते ही नहीं

कुछ के जवाब हमारे ही अंदर छुपे होते है

वो बस इन सवालों के चक्रव्यूह को तोड़ कर

बाहर आना चाहते है

पर उन्हें नहीं पता की ये उनके बस में नहीं


जिसे जो जब पता चलना होता है

तभी होता है, न पहले, न बाद में

वो एक क्षण में, घेरे में फसे होते है

एक क्षण में आज़ाद हो जाते है

उस क्षण पर गौर करे तो जवाबो का खज़ाना

न करे तो सवालों का चक्रव्यूह...



Sapna..

Thursday, March 9, 2023

आशा और निराशा...

मुझे तुमसे नाराज़ होने का तो हक़ है

पर तुमसे ये आस लगाए रखना की

'तुम मुझे मनाओगे', कुछ हद तक ठीक है

पर 'तुम मुझे समझोगे' 

हर बार, हर परिथिति में,

ये सरासर ज़ुल्म होगा...


शायद जब मैं तुमसे मेरा हाल पूछने की आस लगाए हूँ, 

तुम मुझे मेरे हाल पे छोड़ना चाहते हो.

जब मैं तुमसे बातें सुनना चाहती हूँ,

शायद तुम मुझे अपनी बातों से परेशान नहीं करना चाहते.

जब मैं तुमसे मेरे लिए कुछ वक़्त चाहती हूँ,

तुम शायद मुझे खुदके साथ वक़्त बिताते देखना चाहते हो.

जब मैं तुमसे अपनी ज़िन्दगी, अपने वजूद की एहमियत पूछती हूँ,

शायद तुम मुझे खुद की कीमत महसूस कराना चाहते हो.

जब मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करने की जत्तोजेहेत करती हूँ,

तुम शायद मुझे कुछ ना करने का सुकून देना चाहते हो.

जब मैं तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ,

तब शायद तुम मेरा इंतज़ार कर रहे होते हो...


इनमे से कई शायद

और ऐसे बहुत से और शायद सच भी है

इन सब परिस्थितियों में हमारा रिश्ता

'आशा और निराशा' के बीच झूल रहा होता है

अनसुनी आशा, अनकही निराशा..


लेकिन

क्या हमारे माता पिता के अलावा

हमारी अनकही कोई सुन सकता है?

किसीके मन का हाल जानना,

उनकी बातें बिन बोले समझना

क्या रिश्तों को भारी नहीं बना देता?


क्या समाज, रीति- रिवाज़ों

और ज़िम्मेदरियों का बोझ काफी नहीं

जो हम अपने रिश्तों पर और बोझ लादना चाहते है?

हम क्यों नहीं अपने मन की बात खुद ही कह देते?

क्यों हम अपने प्यार, अपनी ख़ुशी के लिए

खुद पहल नहीं करते? 

ऐसा तो नहीं की मांगी हुई खुशियां हमारी नहीं होती

बल्कि वो खुशियां और एहम होती है

जिनके लिए हम खुद कोशिश करते है..


तो मैं अब भी तुमसे नाराज़गी जताऊँगी

पर जो तुम मुझे ना मना पाओ,

तो तुम्हे मनाने का नुस्खा भी बता दूंगी

तुम मुझे समझ ना पाओ,

तो समझाने की कोशिश करुँगी

क्यूँकि शायद मैं अब समझ रही हूँ

की ये ज़िन्दगी एक तोहफा है

इसका लुत्फ़ उठाने बस तुम मेरे साथ रहना...


Sapna.. 

Saturday, March 4, 2023

वाह रे ज़िन्दगी!

 वाह रे ज़िन्दगी!

कितनी शानदार है तू,

और कितनी कंजूस भी.

कितनी खुशमिज़ाज है तू,

और कितनी संजीदा भी..


प्यार से कभी किसी को

कुछ सीखाना तो तुझे आया ही नहीं.

पर तेरे थपेड़ो से ऐसी सीख मिली

कि खानेवाला कभी भूल पाया ही नहीं.


मैं भी उन्ही में से तो एक हूँ

जिसके पास सब कुछ रहते

मज़े से ज़िन्दगी जिया करती.

मुझे ये एहसास था की

जो तूने मुझे दिया है, वो कईओ के पास नहीं

कभी तेरे दिए पे ना शक किया,

न तेरे ना देने पे मायूसी जताई.

'जो होता है अच्छे के लिए होता है',

ये समझ के तुझे पलकों पे बिठाये रखा.


पर कहा जानती थी

 कि जिन चीज़ों के लिए शुक्रगुज़ार हूँ,

उसका तो हिसाब तू करती ही नहीं.


तू तो उन अनमोल लोगो पर नज़र गड़ाए बैठी है,

जिनके बिना हम कुछ भी नहीं

और पल भर में

हमारे तिलिस्म के घेरे से छुड़ाकर 

तू उन्हें उड़ा ले जाती है..


जैसे पहले उनके बिना कुछ होता नहीं,

वैसे ही, उनके बाद भी कुछ नहीं होता..


जैसे किसी बच्चे के लिए

उसके बचपन से ज़्यादा मोल

किसी खिलोने का होता है

वैसे ही हम बेवक़ूफ़, ज़िन्दगी से ज़्यादा मोल

साधनो को देने में समय बिता देते है.


और फिर तेरे एक थपेडे से

जैसे नींद जाग जाती है.


वाह रे ज़िन्दगी!

कितना देती है तू,

और कितना छीनती भी.

कितना हँसाती है तू,

और कितना रुलाती भी...


Sapna..

Saturday, February 25, 2023

रूबरू..

मैं रोना चाहती हूँ

नहीं...

पर अब नहीं 

पापा की हिम्मत टूटने नहीं देनी है

दीदी का सहारा भी तो बनना है

कल जी भर के रो लुंगी...


(अगले दिन..)

अरे आज तो सारा परिवार यहाँ है

आज माँ को अलविदा कहना है

भाई और भाभी से माफ़ी मांगनी है

उनको दिया हुआ वादा जो नहीं निभा पाए


अब उनसे नज़रे कैसे मिला पाएंगे

इतना तो कर सकते है

की उनके सामने नही रोयेंगे


(2 दिन बाद..)

रेल गाडी और हवाई जहाज में

अनजान लोग बहुत है

बेवजह सब घूरेंगे

यहाँ नहीं रोना है


(कुछ दिन बाद..)

कुछ दिन यहाँ रुक के, 

ज़िन्दगी को सामान्य करने की कोशिश करेंगे

आज बेटा मिलने आया है

भांजा और भतीजी भी हमें ताकते है

हमारे बच्चे कुतूहल और अचंभे से देखते है

कौन है ये इतने सारे लोग?

क्यों आते है रोज़ घर पे इतने लोग?

इन बच्चों के सामने रोना क्या ठीक होगा?


नहीं नहीं..

मैं घर जाके सिर्फ उनके सामने रोउंगी.. 

वो मेरी बातें सुनेंगे, मुझे सहारा देंगे

मेरी मनोदशा समझेंगे

हाँ...

उनके सामने रोने में क्या हर्ज़?


घर आके उन्हें देखा

पर वो तो ज़िन्दगी की दौड़ में व्यस्त है

उनके काम में दखल कैसे दिया जाए? 

तो तय हुआ की

उनके दफ्तर जाने के बाद रोया जाए...


अकेले में जब खुद से मिली,

रोने की बहुत कोशिश की

ना पलके भीगी, ना आंसू आये, 

शायद आंसू सूख गए होंगे..


दिन भर अपना काम करके

अंत में प्रार्थना करके

बिस्तर पे लेटी,

आँखें बंद की,

माँ को देखा,

और एकाएक आंसुओं की बौछार शुरू हो गई


शायद उन्हें मुझसे एकांत में रूबरू होना था

जब हम दोनों की बातें रोकने वाला कोई ना हो..

उनकी बातें मैं घंटों सुनती रही

और ये आँखें बिना थके रोती रही...


Sapna..

Friday, February 24, 2023

नहीं लगता ..

 आपके बीना आइस क्रीम में ठंडक नहीं

मक्खन खाखरे में स्वाद नहीं

भुट्टे की चटनी तीखी नहीं

चाट में चटकारा नहीं


आपके बिना सिनेमा में मज़ा नहीं

मस्ती में मनोरंजन नहीं

शॉपिंग में ख़ुशी नहीं

गानों में अर्थ नहीं


आपके बिना शादियों में जशन नहीं

लहंगे में खूबसूरती नहीं

चूड़ियों में खनक नहीं

चश्मे में चमक नहीं


आपके बिना दिवाली की रौनक नहीं

नए साल की बधाई नहीं

माताजी का ठंडा नहीं

होली में रंग नहीं


आपके बिना बादाम का दूध नहीं

सर्दिओं की मिठाई नहीं

आम की गुठलियों का मज़ा नहीं

पकोड़ो भी करारे नहीं


आपके बिना बच्चों को लाड नहीं

पापा और हमको डाँट नहीं

भाई के साथ गोद की लड़ाई नहीं

माथे पर सुकून से सेहलाहट नहीं


आपके बिना गर्मी की छुट्टियां नहीं

रिसोर्ट का प्रोग्राम नहीं

रात भर जाग के बातें नहीं

घर पे डांस की पार्टी नहीं


आपके बिना फोटो में यादें नहीं

फ़ोन पर रोज़ के गप्पे नहीं

मिलने का इंतज़ार नहीं

कल की तैयारी नहीं


आपके बिना हम है तो सही

पर आपके बिना हम हम ही नहीं

घर तो वही है मगर

आपके बिना घर, घर ही नहीं..


Sapna..

Wednesday, February 22, 2023

तुम बिन...

तुम बिन जैसे

जड़ बिना वृक्ष

तुम बिन जैसे

वायु बिना सांसें

तुम बिन जैसे

आत्मा बिना शरीर

तुम बिन जैसे

दिशाहीन यात्रा


तुम्हारी कोशिशो के आगे

हमारी कोशिश बेकार लगती है

तुम्हारे मातृत्व के सामने

हमारी ममता असार लगती है


हर एक की, हर चीज़ का ख्याल

कैसे रख लेती थी?

अपने अपनों की खामियां

कितनी खूबसुरति से छुपा लेती थी

दुःख में खुद घिरी होकर भी

हम तक सिर्फ ख़ुशी पहुँचाती

माँ, तुम्हारी अजीब-ओ-गरीब तरक़ीबें

हमें तकलीफ से बचा लेती


सब कहते है, हिम्मत रखो

वक़्त के साथ सब ठीक हो जायेगा

उन नादानो को क्या समझाए

की ये परिवार अब एक सूखा कुआ है

इसमें ममता का मधुर जल

फिर कभी ना भर पायेगा..


ऐसा नहीं की हम प्रयत्न नहीं करते

बस उसमे पूरी जान नहीं लगा पाते

उसका एक हिस्सा तुम्हारे साथ विदा जो हो गया


अब तो आंसू भी इजाज़त नहीं लेते

बेबाक छलक जाते है

वो समझते है की अब

उन्हें बहने से रोकने वाला कौन?


खैर, फिर कही, किसी और जनम में 

आपसे फिर मुलाक़ात हो

ये प्रार्थना सुबह शाम करते है

रात ढली, दिन निकल गया

चलो, अपने अपने काम पर चलते है


Sapna..

Monday, February 13, 2023

दम तोड़ देना...

दम तोड़ देना...

क्या अर्थ होता है इसका?

क्या सच में ऐसा होता भी है?


सारी ज़िन्दगी सबको खुश करके

अपनी अंतिम यात्रा पे

अपनों को रोता हुआ छोड़ जाना

क्या वाक़ेय मुमकिन है?

क्या उस इंसान की

ज़िन्दगी भर की महनत दम तोड़ सकती है?


उस इंसान से कभी दूर रहने के

ख्याल से भी डरने वाले लोग

उन्हें खुद सजा के, आखरी पड़ाव तक ले जाते है

क्या उनका लगाव दम तोड़ सकता है?


चाहे कितने ही लोग फिर मिलने आये

कितनी ही अच्छी बातें कहे

पर उस एक इंसान से बात करने की, 

उसे फिर से ढूंढ लेने की चाह

कभी दम तोड़ सकती है?


जो पल कैद किये हो

तस्वीरों में और मन में

उनके जाने के बाद,

क्या उन यादों की

ख़ुशी दम तोड़ सकती है?


उनके आस पास होने पर

उनके साथ वक़्त बिताने पर

कुछ ख़ास लगता था

क्या वो एहसास दम तोड़ सकता है?


उनके बाद

न ग़म ख़तम होते है,

न खुशियां

तब हमारा हौसला बढ़ाता,

हमे तसल्ली देता

क्या उनका आशीर्वाद दम तोड़ सकता है?


सब कहते है वो दूर से हमे देख रहे है

हमारी हर मुश्किल में वो राह दिखाते है

अंधेरों में रौशनी फैलाते है

पर उनका आकार बदल जाने से

क्या उनका साथ दम तोड़ सकता है?


उम्र बढ़ते बढ़ते

यादें धुंधली होती जाती है

तो क्या भूली बिसरि याद में

उनसे मिलने की तड़प दम तोड़ सकती है?


मेरे ख़याल में..

दम तो टूटता है

उन कोशिशों का,

जो उन्हें अपने पास रखने के लिए की जाती है

उन अनगिनत लम्हो का,

जो उनके साथ बिताये जा सकते थे

उन यादों का,

जो उनके साथ बनाई जा सकती थी..

दम इंसान का नहीं टूटता

बस उसकी एक यात्रा का टूटता है

और वो चल पड़ते है

कही और, किसी और के साथ

एक नई यात्रा पे...


Sapna..


Saturday, February 11, 2023

चमत्कार..

चहचहाती हुई घर में फिरती

उसकी आवाज़ जैसे घर में गूंजती 

कभी बेबाक शरारतें करती

कभी लोगो की नक़ल उतारती

औरों को हँसने का मौका देती

मुश्किलों में वो हौसला बढाती


अब ये आँखों को क्या दिख रहा है

सारा घर यूं शांत सा पड़ा है

यहां क्या कुछ अविश्वसनीय हुआ है?


आज वो चुप सी है

शायद किसीकी याद में

बहुत रो चुकी है


अब वो पाबंदियों से परे है

शायद किसी को खोजते हुए

खुद ही खो चुकी है


अब उसकी आँखों में नींद कहा

शायद किसीकी गोद में

जी भर के सो चुकी है


सब कुछ तो है उसके पास

न जाने किस बात पे ऐंठी है 


बाहर की तरफ जाने वाले दरवाज़ों को

जैसे अंदर से बंद करके बैठी है


अखबार का एक शोक सन्देश पढ़के

खुदको कुछ यकीन दिलाने की

नाकाम कोशिश करती है


बहुत देर तक उसे देखने के बाद

न मान कर, थक हार कर

उससे मुँह मोड़ लेती है


एहसास को न बता सकती है

न दबा सकती है

बस एक चमत्कार की आस में

आसमान की ओर ताकती हुई

इच्छा पूरी होने की प्यास रखती है


Sapna.. 

Tuesday, February 7, 2023

उम्र..

जिन्होंने ज़्यादा ज़िन्दगी जी है,

उन्होंने ज़्यादा मौते भी देखी होंगी

शायद इसीलिए बढ़ती उम्र के साथ

मृत्यु की स्वीकृति बढ़ जाती है


पर मैंने कल्पना भी ना की थी

की मुझे जीवन देने वाले के 

जीवन का अंत मेरी आँखों के सामने होगा

मैं इसके लिए ना तब तैयार थी जब ये हो रहा था

ना मैं अब तैयार हूँ, जब ये हो चुका है!


मुझे उम्र के सफर में आगे नहीं पीछे जाना है

मुझे ना प्रौढ़ता चाहिए, ना जवानी, ना लड़कपन

मुझे अपना बचपन चाहिए


वही जहाँ मैं तुम्हारी गोद में सोया करती थी

वही जहाँ मैं तुम्हारे ध्यान के लिए रोया करती

वही जब तुम्हारे आँचल की छाव मिलती

वही जब मुझे देख तुम्हारी मुस्कान खिलती


अब जो चाहू पा सकती हूँ

पर तुम्हारा निश्छल प्यार कहा मिलेगा

इस चक्र को कोई पलट सके

तो बढ़ती उम्र को चकमा देके 

फिर से ५ बरस की हो जाऊ?...


Sapna..


नाराज़...

 कुछ दिनों से आपसे नाराज़ सी हूँ

पर आपसे बातें फिर भी करती रहती हूँ

धोखेबाज़, जल्दबाज़, खुदगर्ज़

सब कह दिया आपको..


कितना कुछ कहना था आपसे, 

कितना कुछ सुनना भी था

कितना और घूमना-फिरना था,

कितनी यादें बनानी थी


साथ सिनेमा देखने जाना था

नई जगहो पर खाना था

कई सारी तसवीरें खिचवानी थी

किस्से सुनाकर आपको डराना था


पापा के हाथ से आपको

ज़बरदस्ती मिठाई खिलानी थी

बच्चों के चहीते गानों पे

नाचते हुए आपकी वीडियो बनानी थी


अपनी गलतियों के लिए

आपसे डाँट सुननी थी 

वो ही साड़ी बार बार पेहेन ने पर

आपसे लड़ाई भी तो करनी थी 


छोटे बड़े खिशियों के लम्हे

अभी आपके साथ जीने थे

दुःख, दुविधा, सम्रिद्धि, स्वास्थ

ज़िन्दगी के कई रस आपके साथ पीने थे


पर अब धीरे धीरे ये समझ आ रहा है...


की अगर आपके बस में होता

तो आप कभी हमे छोड़के ना जाती

आपके घर में और हम सब में

आपकी जान जो बस्ती थी


मलाल तो कई चीज़ों का रहेगा मगर

अब आपसे नाराज़ रहने को जी नहीं करता

फिर भी ​एक चीज़ के लिए ताउम्र नाराज़ रहूंगी 

की आप हमारे लिए कई सारी चीज़ें छोड़ गई

माँ, आपने वो चीज़ें खुद ही क्यों नहीं इस्तेमाल की?


Sapna...

रंग...

मुझे हर रंग में माँ

तेरे रंग दिखाए देने लगे है


सुबह की धूप सी खिली खिली

तेरे मुस्कान का रंग पीला

हम बच्चों को डाटती फटकारती

गुस्से का तेरा रंग नीला


जब तू लेहेंगा पहन के सजती

तुझपर खिलती ओढ़नी लाल

जब पापा तुझे मिठाई खिलाते

तो शर्म से गुलाबी होते तेरे गाल


तेरे आशीष से फलता-फूलता

हरा - भरा सा तेरा परिवार

हमारे हर गलत को सही करता 

सौम्य - शीतल सफ़ेद सा तेरा दुलार


अपने अंदर इंद्रधनुष का

हर रंग तुम बसाया करती हो

अपने रंगो के पिटारे में से

कुछ अपने अपनों के नाम करती हो


मुझे हर रंग में माँ

तेरे रंग दिखाए देने लगे है

उन सब रंगो को बटोरकर

एक - एक हिस्सा हम अपने पास रखने लगे है..


Sapna...

Monday, January 30, 2023

भिखारी...

 एक वक़्त था जब मैं आपसे घंटो बातें किया करती

उन इधर-उधर की बातों में वक़्त का पता ही नहीं चलता

अब जो वैसा कुछ हो नहीं सकता

मैं अपने आपको किसी भिखारी सी लगती हूँ

मेरे लिए कटोरा मेरा फ़ोन है

जिसमे आपसे बात करने का मौका, सिक्को जैसा है

आपकी आवाज़ उन सिक्को की खनक सी है


इस उम्मीद में की कोई तो मुझसे बात करेगा

मैं फ़ोन लगाना शुरू करती हूँ

पर कोई मुझसे कुछ मिनटो से ज़्यादा बात नहीं करता


शायद उन्हें मेरी उस तरह याद नहीं आती,

जिस तरह आपको आती थी

शायद किसीको मेरी बातें सुनने में,

वो आनंद ना आया जो आपको आता था

शायद उन्हें मुझसे वो लगाव नहीं,

जो आपको मुझसे था.


ये 'था' लिखने में तो बड़ा आसान है

मगर इसे मानना, विश्वास करना बड़ा मुश्किल

ना जाने कब मैं इस 'था' को अपनाऊँ

फिलहाल तो मैं एक हताश, निराश भिखारी जैसे

बस अपने फ़ोन को घूरा करती हूँ...


Sapna..