Friday, October 31, 2025

आज कल तेरी याद

आज कल तेरी याद इतनी क्यों आती है?

वक़्त बेवक़्त इस क़द्र क्यों सताती है?


ख्याल तेरा है ज़हन में अब भी

बातें करती हूँ मैं तुझसे अब भी

फिर भी तेरे ज़िक्र से

आँख क्यों छलक जाती है?

आज कल तेरी याद इतनी क्यों आती है?


तेरे चेहरे का नूर नयनो में है अब भी

तेरी मुस्कान की छाप दिल पे है अब भी

फिर भी तेरी हर तस्वीर

दिल को चूर - चूर कर जाती है है 

आज कल तेरी याद इतनी क्यों आती है?


तेरा परिवार साथ है अब भी

एक दुसरे की ढाल है अब भी

फिर भी कोई न कोई घटना

तेरी कमी का एहसास दिलाती हैं

आज कल तेरी याद इतनी क्यों आती है?


सीख रखी होती तेरी सर आँखों पर

इच्छा रखी होती तेरी अपने ख्वाबों पर 

तो शायद इस मलाल में

ज़िन्दगी न गुजरने पाती

तो शायद तेरी याद माँ, 

इस तरह न तड़पाती...


Sapna..

Sunday, August 10, 2025

मैं और वो..

मैं फ़र्ज़ निभाती गई, तकलीफ सहते हुए

वो दर्द दिखाते रहे, मौज करते हुए


मैं सर झुकाती रही, मान देते हुए

वो बेइज़्ज़ती करते रहे, मज़े लेते हुए


मैं प्यार लुटाती रही, सबको सहेजते हुए

वो नफरत उगलते रहे, मुझे तोड़ते हुए


मैं ख़ुशी न्योछावर करती रही, दुखी होते हुए

वो और ऊंचे होते रहे, मुझे कुचलते हुए 


मैं ग़लत ठहराई गई, सही होते हुए

वो सही समझे गए, चालबाज़ होते हुए


मैं खुद ही को कोसती रही, नेकदिल होते हुए

वो नीचे ही नीचे गिरते रहे, इंसान होते हुए


मैं मौन ही रहने लगी, ज़बान होते हुए

वो ग़लतियाँ ही देखते रहे, आँखें होते हुए


मैं पूरी तरह हार गई, घायल होते हुए

वो ताने ही कस्ते रहे, घमंडी होते हुए


अब मैं हताश हो गई, यह बोझ ढ़ोते हुए

और भरोसा करना छोड़ चुकी, निराश होते हुए


क्योंकी मैंने देखा है,

सेवा करती बहु को ज़लील होते हुए

और ज़लील करती बहु की पूजा होते हुए


Sapna..

Thursday, July 24, 2025

अब... नहीं.

 रोज़ाना के 3 बजे

ना वो फ़ोन की घंटी का बजना

अब वो दोपहर में दिन भर की बातें नहीं होती


ना मैं उनकी शिकायत करती हूँ

ना वो अपने जमाईसा की तरफदारी

अब वो बेवजह की तकरार नहीं होती


ना पापा की ख़ामोशी का गिला

ना 'क्या हुआ, मुझे बताओ' से दिल रखना

अब वो मन हल्का करने की पहल नहीं होती


ना 'बड़े दिन हो गए, मिलने आजा' की फ़रियाद

ना 'माँ, आज नहीं हो पायेगा' कहके बहलाना

अब वो मिलने का सिलसिला नहीं होता


ना मायके जाने पर माँ के आँखों में चमक

ना घर में बिखरती उनकी ख़ुशी की खनक

अब वो छुट्टियों का इंतज़ार नहीं होता


ना गोद में चैन से सर रखना

ना बूढी कोमल उँगलियों का बालों को सहलाना

अब वो सुकून से आराम नहीं होता


ना मन पसंद चीज़ों की फरमाइश

ना 'अभी बना देती हूँ' की फुर्ती

अब वो बच्चों को सर चढ़ाना नहीं होता


ना नाती, पोती का आगे पीछे फुदकना

ना उनका बच्चों के साथ नाचना - खेलना

अब वो 'नानी तेरी मोरनी' वाली धुन नहीं बजती


ना जमाईसा को लाड से खिलाना

ना बच्चों को प्यार से पुचकारना

अब वो 'तू बस अपना ख्याल रख' सुनना नहीं होता


ना अलमारी के किसी कोने से तोहफे का निकलना

ना लौटते वक़्त पैसे देने पर माँ से लड़ना

अब वो 'मैं हूँ तब तक दूंगी' वाला ब्लैकमेल नहीं होता


रोज़ाना दोपहर के 3 बजे

ना फ़ोन की घंटी का बजना

अब वो 'माँ calling' screen पर देखना नहीं होता


Sapna..

Saturday, March 29, 2025

मैंने देखा था उसे..

मैंने देखा था उसे

रहता था वो यही कही

छोटी सी उम्र थी मगर

बड़े सपनो की कोई कमी नहीं


साइकिल गिर गिर के चलाता

कंचो को खज़ाना बताता

पतंगबाज़ी में रोमांच ढूंढता

चोंटों का कभी कोई ज़िक्र ही नहीं


पापा की डाट से तो डरता

पर उनका सर गर्व से ऊंचा करना चाहता

माँ की गोद, रोटी, दाल चावल

इन्ही में लगता सब कुछ सही


दोस्तों के कन्धों पर हाथ डाले निकलता

नए नए खेलो की तलाश रहती 

हर किसीका चाहे वो दोस्त बन जाता

पर हर कोई उसका दोस्त नहीं


Half pant से full pant पे आना

छोटी छोटी सी मूछो का निकलना

अपनी आवाज़ का भारी होना

उसके बदलावों पे ध्यान कोई देता नहीं


बहन की रक्षा का ज़िम्मा उठता

माँ - बाप के बुढ़ापे का सहारा कहलाता

परिवार को चिराग बनके रोशन करता

भुला देता है खुदके सपने वही


वो बड़ी गाडी की ख्वाहिश

वो दुनिया देखने का शौक

वो बेबाक बेपरवाह सी ज़िन्दगी

दब गई ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कही


वो भीड़ में घुलने की कोशिश न करता

कई बार फ़र्ज़ पे प्यार वार देता

कोई ठहर के उसे नहीं पूछता  

की कही उसकी मंज़िल कुछ और तो नहीं


मैंने देखा था उसे

रहता था वो यही कही

पापा, भाई, दोस्त, पति में ढूंढो

शायद उनमे वो मिल जाए कही..


Sapna..

चले थे कही से..

चले थे कही से

कही को जाने के लिए

कुछ मंज़िल के करीब हुए

कुछ रास्ते ही भूल गए


हम तनहा तनहा थे यही

कभी काफिलों संग हो लिए

कही अंजानो से कारवां जुड़े

कही अपनों के साथ छूट गए


कुछ हमने खुदको कोसा था

कुछ औरों की कमियाँ निकाली थी

कभी काटे भी चाभते न थे

कही फूलों से भी ज़ख्म हुए


कुछ कसमें हमने खाई थी

कुछ वादों पे ऐतबार किया

कही बेगाने भी ख़ास हुए

कही खून के नाते टूट गए


कही ख्वाब मुक्कमल हो गए

कभी पलकों से नींदें रूठ गई

कही पीड़ में एक आह भी न निकली

कभी ख़ुशी में आंसू फूट पड़े


चले थे कही से अकेले

कही पहुंचने के लिए 

कुछ दुआओं का साया रहा

कुछ उपरवाले के रहम हुए


Sapna..