Friday, June 21, 2024

कैसा रहे?

तुम्हे बुलाकर पलट जाऊ 

तो कैसा रहे?

आवाज़ देकर मुकर जाऊ

तो कैसा रहे?

रहे नहीं अब दोस्त या हमकदम तुम

मैं फिर भी तुम्हे गैर ना बताऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारी बेरुखी ना बताऊ

तो कैसा रहे ?

तुम्हारी संगदिली ना जताऊ

तो कैसा रहे ? 

तुम्हारी याद में आँसू बेहिसाब बहे

मैं फिर भी तुम्हे देखकर मुस्कुराऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारी दी चोटे ना दिखाऊ

तो कैसा रहे?

तुम्हारे दिए ज़ख़्म तुमसे छिपाऊं

तो कैसा रहे?

मेरे घाव की परवाह तुमने की नहीं

मैं फिर भी तुन्हे मरहम लगाऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारे सपनो में आकर जगाऊ 

तो कैसा रहे ?

जैसे तुमने सताया, वैसे सताऊ

तो कैसा रहे?

मेरी नींदें तो तुमने उड़ा ही दी

मैं तुम्हे चैन की नींद सुलाऊ

तो कैसा रहे?


Sapna..



मेरे जैसी...

 मुझे, मेरे जैसी मैं,

हर किसीमें दिखने लगी है


आईने के सामने खड़ी

खुद की सुंदरता निहारती मैं


अपने चेहरे, अपने शरीर की

बनावट पर संदेह करती मैं


रोज़ घर पर रुक कर

परिवार का ख्याल रखती मैं


ज़रूरत पड़ी तो देहलीज़ लाँघकर 

रोटी कमाने बाहर निकलती मैं


कही कोशिश करने से,

पहला कदम बढ़ाने से डरती मैं


किसी कामयाबी के शिखर पर

सबको साथ लेकर चलती मैं


कभी अपनों की ख़ुशी के लिए

चुप - चाप सहती मैं


कभी अपनी आवाज़ पहचानकर

बग़ावत पर उतरती मैं


कही कैद में

आज़ादी के सपने बुनती मैं


कही उम्मीद की किरण बनकर

राह को रोशन करती मैं


किसी कहानी की किरदार बने

अभिनय करती मैं


कई कहानियों को रूप देती

रचइता, निर्देशक मैं


मुझे, मेरे जैसी मैं,

हर किसी में

जनम लेती, बढ़ती दिखती है


इस कविता को लिखती,

लिखी जा रही मैं


इसी के माध्यम से

नया अस्तित्व पाती मैं


Sapna..

Wednesday, June 12, 2024

तुमसे करती थी जो बातें..

 तुमसे करती थी जो बातें

अब तुम्हारी तस्वीर से कर लेती हूँ


रह गई जो अनकही सारी

कविताओं में लिख लेती हूँ


तुमसे मिलने का मन जब हो

सपनो में मिल लेती हूँ


तेरे साथ यादे बनाना

अब ख़यालों में कर लेती हूँ


तुम्हारे आशीर्वाद की गूँज

अपनी प्रार्थना में सुन लेती हूँ


तुम्हारे छुपे हुए राज़ थोड़े

पापा से जान लेती हूँ


तुम्हारे जीने की एक झलक

तुम्हारी पोती में देख लेती हूँ


तुम्हारी फ़िक्र करने की आदत

दीदी में महसूस कर लेती हूँ


तुम्हारे स्नेह के दरिया का स्रोत

भाभी के अपनेपन में पा लेती हूँ


तुम्हारी दरियादिली के किस्से

भाई के ज़रिए जी लेती हूँ


उदास अँधेरे पलों में हिम्मत

तुम्हारी मुस्कान से ले लेती हूँ


तुम्हे गले लगाने का जी करे

तो तुम्हारी साड़ी पहन लेती हूँ 

मेरी खिड़की के बाहर..

 लहलहाते पेड़ों की डालियाँ थी 

महकती फूलों की क्यारी सुहानी

कूदती फुदकती गिलहरियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


बच्चों की किलकारियाँ थी

स्कूल की चहलपहल बचकानी

भोली भाली बेदाग़ यारियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


मिलते - जुलते लोग थे

बाँटा करते अपनी परेशानी

बातों बातों में बनते संयोग थे

मेरी खिड़की के बाहर


एक ज़माना बीत गया है

खुशनुमा सी थी तस्वीर पुरानी

अब मंज़र ही बदल गया है

मेरी खिड़की के बाहर


गिरते - कटते वृक्ष है

बेजुबानो के उजड़ते आशियाने

बिगड़ रहा प्रकृति का अक्स है

मेरी खिड़की के बाहर


भक्षक बानी इंसानियत है

खौफ में बचपन की कहानी 

दम तोड़ रही मासूमियत है

मेरी खिड़की के बाहर 


वाहनों की आवाजाही है

दिन - ब - दिन बढ़ती ध्वनी

डिब्बों में कैद आज़ादी है

मेरी खिड़की के बाहर


ऊंचे - ऊंचे से मकान है

उनमें अजनबियों की रवानी

सबमें झलकती एक थकान है

मेरी खिड़की के बाहर


अंतरजाल से बुना जीवन है

सुविधा से हार रही सावधानी

शोर में चीखता अकेलापन है

मेरी खिड़की के बहार


गरीब की हालत पस्त है

जान, ईमान या हो जवानी

हर खरीद का बंदोबस्त है

मेरी खिड़की के बाहर


हर पल बढ़ती प्यास है

और सूखता जा रहा पानी

जाने कैसे कल की आस है

मेरी खिड़की के बाहर


Sapna..