Monday, August 19, 2024

एक आँसू...

मैं रोती नहीं आसानी से

पर पीड़ा उसकी सोच के

एक आँसू मेरा टपक गया 


जब अकेले, बेसहारा जान के

दरिंदे उस पर टूट पड़े

उसकी दहशत के ख़याल से

हर जर्रा मेरा सिहर गया


उसकी जीने की चाह को

भूखे भेड़िए रोंधते गए

उसके संघर्ष की कल्पना से

खून का हर क़तरा उबल गया


शीशे से चीरा तन को 

जिस्म के हिस्से तोड़े गए

चीखें उसकी कानों में गूंजी

एहसास रूह को झकझोर गया


किस उत्साह से डॉक्टर बानी वो 

उसका अंत हुआ किस हैवानियत से

हर वृत्तांत को पढ़के - सुनके

अस्तित्व टूटके बिखर गया


आँसू बेबाक टपक टपक के

सैलाब में तब्दील होते गए

एक लड़की होने के सच में 

हर अन्याय का बोझ सिमट गया


Sapna..


Saturday, August 10, 2024

Shadows of the night

I walk alone and they follow me
Shadows of the night, are all I see

I try to run, they keep up the speed
If I am scared, they don't pay heed

For when I stop, they come to me
And whisper in my ear disapprovingly

You let go, they said
Let it all go, they prayed

The guilt that made you insecure
The sorrow that wasn't yours to endure

The doubts that dint let you flourish
The pain that you were forced to nourish

The shame that pulled you down
The games that made you drown

The questions that made you scowl
The expectations that made you foul

Let go off the bonds and the off kin
That feel dry and rough like peeled off skin

The shadows behind me feel so cold
They face me now and urge to behold

The beauty that God instilled in me
The love that I never set free

The cheers that were directed to me
Compliments that came so unexpectedly

The blessings that never had a price
The good things that came as a surprise

The precious moments that I collected
The most important wealth that I neglected

To see I have the power to hurt and heal
And I'm capable to express and conceal

I am a creation made with pride
But yet, always kept Myself aside

So enough now!
The shadows jolted my heart
And proposed my life needed a new start

I closed my eyes,
took a deep breath in
And swallowed the shadows
That settled deep within

I opened my eyes
Saw a new dawn
"I love you" I said to myself
I promise to never leave you
lost and forlorn...


Sapna..


Friday, June 21, 2024

कैसा रहे?

तुम्हे बुलाकर पलट जाऊ 

तो कैसा रहे?

आवाज़ देकर मुकर जाऊ

तो कैसा रहे?

रहे नहीं अब दोस्त या हमकदम तुम

मैं फिर भी तुम्हे गैर ना बताऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारी बेरुखी ना बताऊ

तो कैसा रहे ?

तुम्हारी संगदिली ना जताऊ

तो कैसा रहे ? 

तुम्हारी याद में आँसू बेहिसाब बहे

मैं फिर भी तुम्हे देखकर मुस्कुराऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारी दी चोटे ना दिखाऊ

तो कैसा रहे?

तुम्हारे दिए ज़ख़्म तुमसे छिपाऊं

तो कैसा रहे?

मेरे घाव की परवाह तुमने की नहीं

मैं फिर भी तुन्हे मरहम लगाऊ

तो कैसा रहे?


तुम्हारे सपनो में आकर जगाऊ 

तो कैसा रहे ?

जैसे तुमने सताया, वैसे सताऊ

तो कैसा रहे?

मेरी नींदें तो तुमने उड़ा ही दी

मैं तुम्हे चैन की नींद सुलाऊ

तो कैसा रहे?


Sapna..



मेरे जैसी...

 मुझे, मेरे जैसी मैं,

हर किसीमें दिखने लगी है


आईने के सामने खड़ी

खुद की सुंदरता निहारती मैं


अपने चेहरे, अपने शरीर की

बनावट पर संदेह करती मैं


रोज़ घर पर रुक कर

परिवार का ख्याल रखती मैं


ज़रूरत पड़ी तो देहलीज़ लाँघकर 

रोटी कमाने बाहर निकलती मैं


कही कोशिश करने से,

पहला कदम बढ़ाने से डरती मैं


किसी कामयाबी के शिखर पर

सबको साथ लेकर चलती मैं


कभी अपनों की ख़ुशी के लिए

चुप - चाप सहती मैं


कभी अपनी आवाज़ पहचानकर

बग़ावत पर उतरती मैं


कही कैद में

आज़ादी के सपने बुनती मैं


कही उम्मीद की किरण बनकर

राह को रोशन करती मैं


किसी कहानी की किरदार बने

अभिनय करती मैं


कई कहानियों को रूप देती

रचइता, निर्देशक मैं


मुझे, मेरे जैसी मैं,

हर किसी में

जनम लेती, बढ़ती दिखती है


इस कविता को लिखती,

लिखी जा रही मैं


इसी के माध्यम से

नया अस्तित्व पाती मैं


Sapna..

Wednesday, June 12, 2024

तुमसे करती थी जो बातें..

 तुमसे करती थी जो बातें

अब तुम्हारी तस्वीर से कर लेती हूँ


रह गई जो अनकही सारी

कविताओं में लिख लेती हूँ


तुमसे मिलने का मन जब हो

सपनो में मिल लेती हूँ


तेरे साथ यादे बनाना

अब ख़यालों में कर लेती हूँ


तुम्हारे आशीर्वाद की गूँज

अपनी प्रार्थना में सुन लेती हूँ


तुम्हारे छुपे हुए राज़ थोड़े

पापा से जान लेती हूँ


तुम्हारे जीने की एक झलक

तुम्हारी पोती में देख लेती हूँ


तुम्हारी फ़िक्र करने की आदत

दीदी में महसूस कर लेती हूँ


तुम्हारे स्नेह के दरिया का स्रोत

भाभी के अपनेपन में पा लेती हूँ


तुम्हारी दरियादिली के किस्से

भाई के ज़रिए जी लेती हूँ


उदास अँधेरे पलों में हिम्मत

तुम्हारी मुस्कान से ले लेती हूँ


तुम्हे गले लगाने का जी करे

तो तुम्हारी साड़ी पहन लेती हूँ 

मेरी खिड़की के बाहर..

 लहलहाते पेड़ों की डालियाँ थी 

महकती फूलों की क्यारी सुहानी

कूदती फुदकती गिलहरियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


बच्चों की किलकारियाँ थी

स्कूल की चहलपहल बचकानी

भोली भाली बेदाग़ यारियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


मिलते - जुलते लोग थे

बाँटा करते अपनी परेशानी

बातों बातों में बनते संयोग थे

मेरी खिड़की के बाहर


एक ज़माना बीत गया है

खुशनुमा सी थी तस्वीर पुरानी

अब मंज़र ही बदल गया है

मेरी खिड़की के बाहर


गिरते - कटते वृक्ष है

बेजुबानो के उजड़ते आशियाने

बिगड़ रहा प्रकृति का अक्स है

मेरी खिड़की के बाहर


भक्षक बानी इंसानियत है

खौफ में बचपन की कहानी 

दम तोड़ रही मासूमियत है

मेरी खिड़की के बाहर 


वाहनों की आवाजाही है

दिन - ब - दिन बढ़ती ध्वनी

डिब्बों में कैद आज़ादी है

मेरी खिड़की के बाहर


ऊंचे - ऊंचे से मकान है

उनमें अजनबियों की रवानी

सबमें झलकती एक थकान है

मेरी खिड़की के बाहर


अंतरजाल से बुना जीवन है

सुविधा से हार रही सावधानी

शोर में चीखता अकेलापन है

मेरी खिड़की के बहार


गरीब की हालत पस्त है

जान, ईमान या हो जवानी

हर खरीद का बंदोबस्त है

मेरी खिड़की के बाहर


हर पल बढ़ती प्यास है

और सूखता जा रहा पानी

जाने कैसे कल की आस है

मेरी खिड़की के बाहर


Sapna..

Friday, May 24, 2024

Turmoil..

How do I feel? 
Where do I begin?
I'm quiet outside
With a turmoil within..

Like I'm here somewhere
But I'm not here at all
Like I'm playing cricket 
Without seeing the ball

And I look alright
But there's always a prick
And it doesn't even show
As if some magic trick

I'm in a deep slumber
And yet wide awake
As if burning in fire
And feeling a snowflake

Sometimes I also talk
Other times I'm mute
But the voices in my head
Seem adamant to refute

So I walk a lonely street
Full of people and cars
And I look at empty sky
Twinkling with million stars

To find fulfilling answers
And calm myself down
But words are dirty dancers
Making me look like a clown

Now I'm aboard a ship
Sailing in whirlwind
So I colour myself white
With a light blue tint

Trying to camouflage 
Between the clouds and water
Finding an invisible passage
Towards a journey to forever..


Sapna..





If there's a place...

 If there's a place I want to be

It'll always be your lap undoubtedly.


My head in your lap

My eyes shut to cruise

Your hand on my forehead

Healing my innermost bruise


The smile on my lips

That feeling is so rare

Your soft, warm fingertips

Running through my hair


Your rocking so gently

Preparing me for a sound sleep

Your humming sweet melody

Sounding usual yet so deep


The feelings in your heart

Full of love, pride and blessing

Travel straight to my heart

Giving my life it's meaning


The moments I crave for

This experience I long

All this happened afore

But it's where I truly belong


Our bond remains so uncanny

Only You have power to set me free

And if there's anywhere I pray to be

Your Lap Forever it's going to be...


Sapna..

Saturday, May 18, 2024

वक़्त हो चला..

 वो कई सालों से उसी जगह खड़ा था

ना जाने कितने सालों से

न उसे किसीने जन्म लेते देखा

न बढ़ते हुए, न बूढा होते हुए


धूप, छाओं, बारिश, हवाएँ,

नहीं डगमगाया किसी परिस्थिति में

आज न जाने कौनसी क़यामत

छोड़ गई उसे इस स्थिति में


चल रही है बेदर्द आरियाँ

बदन बिखरा पड़ा टुकड़ो में

कल तक जो हरा भरा जीवन सा था

अब गिना जाएगा मुर्दों में


स्वार्थियों के साथ जिया

शायद इसी जुर्म की सज़ा है ये

आरसे से संभाले रखा जिसने

कोई न आगे आया उसे संभालने


जब मायने ही न रहे जीने के

कर दिया खुदको तूफान के हवाले

और मूँद ली आँखें ये सोचके

की वक़्त हो चला, अब चलते है..


Sapna...

Thursday, May 16, 2024

कोई एक...

 वह उसे दिखाता नहीं

वह ज़्यादा जताती नहीं

 

मगर वह उसके आंसुओं से

नफरत करता है

और वह उसकी हर परेशानी को

अपना मानती है

 

वह चुपके से उसकी

खुशी की कोशिश में लगा रेहता है

और वह उसके सुख में

खुदकों ढालती रहती है

 

दुनिया के सामने वह

अपने जज़्बात कहता नहीं

लोगों के आगे वह

उसे छेड़ने से थकती नहीं

 

वह सिर्फ नज़रों से

उसकी तारीफ करता है

और वह बिन बोले

उसकी पसंद का खयाल रखती है

 

वह कभी उसे

दायरे में नहीं रखता

और वह अपने इश्क़ को

उसके लिए छुपाए रखती है

 

प्रेम तो दोनों ही करते है मगर

सत्या तो यह है

की हर रिश्ते में,

कोई एक

दूसरे को ज़्यादा चाहता है..  



Sapna..

Tuesday, April 16, 2024

शारीरिक रूह...

मेरी रूह शारीरिक है

मैं उसे महज़ महसूस नहीं कर सकती 

बल्कि

उसे छू सकती हूँ 


वह मुझे कभी

कभी अत्यंत सराहनीय लगती है

और कभी

मैं उसे मिटा देना चाहती हूँ


मेरा लेखन

मेरे शरीर कि रूह सा है

वह मेरे अंत के बाद

कही भटकेगी नहीं

वह मेरी किताब में

छुपी बैठी मिलेगा


किताब के खुलते ही

जैसे शब्द रिहा होते है

मेरे लिखे में

मेरी रूह आज़ाद उड़ती रहेगी

Monday, April 15, 2024

सैलाब

 अस्तित्व के किनारे पर 

अच्छी - बुरी आदतें 

कभी निडर, कभी घबराए 

हंसती - रोती बातों किया करती है


लम्हे महीन रेत से 

यहाँ वहाँ खेलते कूदते रहते है


कुछ खुशियों की लहरें

दुःख को धो देती है

तो कुछ उम्मीदें ऊंची ऊंची 

हिलोरे लगा लिया करती है


जीवन बस इन सबमें

गोते लगाने में व्यस्त रहता

और मौत एक सैलाब सा

सारा सही और गलत बहा ले जाती है

Sunday, April 14, 2024

अँधेरी सुबह

सारा घर भरा हुआ था

उसके आने के इंतज़ार में

अनदेखा सा माहौल था 

हलचल सी थी परिवार में


कुछ लम्हे थम से गए थे

कुछ बिखरे थे आँगन में कही

कई किस्से किसीको याद से आते

कही यादें दिलों में दस्तक देती


वो आई जिसके लिए पलके थी बिछी

उसके होने पर हर नज़र खींची चली


लाल लहंगा, गोटेदार चूनर

आँखों में काजल, माथे पे बिंदी 

होठों पे लाली, हथेली पे मेहेंदी

माथे पे बोर, हाथों में चूड़ी

सुंदरता में कसार न रही कोई


बहन, भाभी और लड़कियाँ

उसे सबने मिलके सजाया

सामने आए पतिदेव, भरी उसकी मांग

और बच्चों ने ओढ़ाई उसे, उसकी पसंदीदा शॉल

उठाए उसे बड़े नाज़ों से

लेकर निकले देहलीज़ के पार

कंधे थे वही चार

लेकिन वो थी नई यात्रा के लिए सवार


भोर वो औरों के लिए उजाली रही होगी

उसके परिवार की आज अँधेरी सुबह थी

जब भाई, बेहेन अपनी बेहेन को

जब उसके पति, अपनी संगिनी को

उसके बच्चे अपनी माँ को

उसके नवासे और पोती अपनी नानी/दादी को

और आए हुए लोग, एक बेहद भले इंसान को

अलविदा कहने इकठ्ठा हुए थे

Saturday, April 13, 2024

मैं और मेरा लिखना..

मैं और मेरा लिखना

आँख मिचोली खेलते है एक दुसरे से


जब वो मेरे पास आए तो मैं व्यस्त होती हूँ

जब मैं उसे ढूँढू वो कही छुप जाता है


जब कोई ख़याल मन में आता है

शब्द मेरे गुम हो जाते है


कोई पंक्तियाँ मन सोच पाता है

हाथों को लिखने का वक़्त नहीं मिल पाता है


इत्मिनान से लिखने बेठू कभी

तो ख्याल छोटे बच्चो से उथल पुथल मचाते है


अपने लेखन को टटोलने लगती हूँ

तो वो मुझसे रूठ सा जाता है 

मिन्नतें करू पर वो मुँह चढ़ाए उकडू बैठ जाता है

उसे मानाने की कोशिश नाकाम होते देख 

"फिर तुझे कभी नहीं टालूंगी" का झूठा वादा करना पड़ता है


मुस्कुराकर वो मुझसे लिपट जाता है

फिर हम दोनों शब्दों की डोर से बंधे

ख़ुशी के गुब्बारे में साथ साथ उड़ जाते है..


Sapna..

Wednesday, April 10, 2024

स्वरूप..

 सुबह सबसे पहले उठके

सबका पेट भरने की व्यवस्था करती

कपडे धो, सूखा के तह करती, बर्तन चमकाती

पराये घर को अपना समझ सुन्दर बनाती


बड़े स्नेह से बच्चों को जगा कर तैयार करती

पति की थाली में गरम नास्ता परोसती है

वो काम पे जाता और बच्चे स्कूल 

फिर वो अपने बाकी कामों में लग जाती


बिना शिकायत जब तक काम करती

सबको भली लगती, बड़ी सुहाती

अपनेआप को जब एहमियत देने लगती

कभी खुदगर्ज़, कभी बेशरम कहलाती


पति की कठोरता, बच्चो की अज्ञानता

"नसीब है मेरा" समझ के जीती

निगलती तठस्थता के निवाले

अपमान के वो घुट पी लेती


इंसान के रूप में जन्मी तो थी

पर ये बात वो क्यों नहीं समझती

की जो हाथ थामे उसे हाथ उठाने का हक़ नहीं

जिसे जनम दिया उनका नाशुक्रा होना ठीक नहीं

 

बेजान सी होकर जैसे दिन गुज़ारती

रोज़ अपने अस्तित्व की हत्या कर देती

ना किसीसे सवाल न अपेक्षा रखती

सबके सुख की चाह हमेशा करती 


कौन है ये? 

कहा रहती है?

वो जो सबकी खशी चाह के

खुद हमेशा दुःख सहती है 

कहा से लाती है वो ये

त्याग, निस्वार्थता और आत्मबल?

कैसे रहके मूक, मर मर जीती हर पल?


उस मन की सुंदरता के आगे

ये मतलबी, लालची दुनिया कुरूप है

वो ना केवल पत्नी है,

ना बहू और ना तुम्हारे बच्चों की माँ

नारी के रूप में

वो शक्ति का स्वरूप है..


Sapna

Thursday, February 8, 2024

झुर्रियाँ...

आज अकेले बैठे हुए

अपने हाथों पर नज़र पड़ी

कुछ रूखे से लगे मुझे

गौर से देखा और पता चला

की ये रूखापन सर्द मौसम का नहीं 

ये तो महीन झुर्रियां है


एकाएक माँ के हाथों की याद आ गई

उनके हाथ कभी ऐसे ही हुआ करते थे 

पर मुझसे कही ज़्यादा नरम

कई ज़्यादा काम किये हुए

कई ज़्यादा आंसू पोंछे हुए

कई ज़्यादा हिम्मत देते हुए


फिर ख्याल आया की ये झुर्रियाँ

बड़ी जल्दी दिखने लगी

अभी तो बहुत सारा काम है


छुट्टियाँ होनेवाली है,

एक बार पीहर जाना बाकी है

बहनो संग गप्पे लड़ाना,

जीजाजी संग आइस क्रीम खाना बाकी है

भाई भाभी संग घूमना,

पापा से बातें करना बाकी है

माँ को गए एक साल हो गया

पर अभी उनकी तस्वीर से बातें बाकी है 


बच्चों संग यादें बनाना,

उन्हें आत्मा निर्भर बनाना बाकी ही

इनके साथ गाने सुनना,

कई और यादें बनाना बाकी है

अरे दोस्तों से अरसे से कहा मिली

उनके साथ सुख दुःख बाँटना बाकी है


फिर ख्याल आया की ये महज झुर्रियां है

समय समाप्ति का इशारा नहीं

पर बाकी काम और अधूरे सपने

अब टालने नहीं है


शुक्रिया झुर्रियों..

बस तुम एक वादा करना,

चाहे शरीर पर कितनी ही पड़ो

कभी रिश्तों पर तुम्हारी नज़र ना हो...

Sapna..


किताबों के शहर...

आज घूमने निकली हूँ मैं

किताबों के शहर

कविताओं के यहाँ पुल है

कल्पनाओं से है घर


शब्दों के ऊँचे पहाड़ों के बीच से 

बह रही विचारों की नहर

रंग- बिरंगे, उदास और खुशमिज़ाज

उसमे समाये ऐसे कई पत्थर


बहती रही वो बलखाती हुई

मोड़ और रुकावट की उसे क्या फ़िकर 

चली मैं उसके पीछे पीछे

पहुंची रचनाओं के समंदर


बिखरे है कई शब्द किनारे पे

भावनाओं से भरी हर लहर

गोते लगाए जब विशालता में

पड़ी एक नए अस्तित्व पर नज़र 


इसी तरह गुज़रे रातें मेरी

यही शुरू हो हर एक सहर

खोलू मन की खिड़की जब भी

सामने हो कहानियों का महासागर!!


Sapna..

Friday, February 2, 2024

मेरे सफ़ेद बाल...

कई दिनों से दिल में है ये खयाल

कि रंगवालु अपने नए नए सफ़ेद बाल


जब जब आईने में खुदको देखा

तो खुदको जैसे औरों की नज़रों से देखा


की अभी तो तुम जवान हो

फिर सर पे ये सफ़ेद बालों का क्या काम?

बूढी, आंटी, माजिया, बुजुर्ग

ना जाने दिया जाएगा मुझे कौनसा नाम!


तुम हमसे छोटी हो, हम से कुछ सीखो

बाल रंगवालो और हम जैसे tip-top दिखो

कानों में ये आवाज़ें जैसे गूँजने लगी

क्या करू कुछ समझ आया नहीं


दिल कहता की ऐसी ही रह जाऊ

दिमाग कहता की मैं टिपण्णी ना सुन पाऊ


फिर जब नज़र अपनी ही आँखों पे पड़ी

उनमे देखि मैंने खुदकी दमकती हुई छवि

वो नज़रें मुझे कुछ बताने लगी

अपनी ही एहमियत जताने लगी


तुम्हारे ये जो सफ़ेद बाल है

वो महज़ उम्र बढ़ने की निशानी है

ना इनसे तुम्हारा वजूद बदलेगा, ना व्यवहार

ना इनसे तुम्हारा हुनर घटेगा, ना अपनों का प्यार

फिर क्यों सहना बेवजह अपेक्षाओं का भार?

आलोचनायें तो होती ही है अपार..


बचपन से बस बढ़ना ही तो कायम है 

अब कहाँ तुम्हारी त्वचा वैसी मुलायम है?

कद बढ़ा तब तो किसीने शिकायत ना की

रूप में भी तो तुम सुन्दर होती गई

जूतों को लेके भी तो होता है बवाल

10 नंबर के ढूंढने में हो जाता है बुरा हाल ...


अब चमकने लगे है उम्र से ये बाल

तो इन्हे अपनाने में इतने सारे सवाल?

ये शंकाएं तुम्हारी नहीं, विज्ञापको की दी है

ऐसे ही तो बढ़ती उनको बिक्री है...

ठीक है रंगवालो इन्हे काले, लाल या भूरे

कुछ दिनों में फिर ऐसे ही दिखेंगे पूरे


मेरी मानों जैसी हो, वैसी ही रह जाओ

पैसे बचाओ, बालों का कुदरती सत्त्व भी

बिना शर्त खुद से प्रेम कर पाओ

यही तो है जीने का सही तत्त्व भी..


आँखों की बातें सुनके, आया ये ख़याल

ख़ामख़ा क्यों मिलाऊ मैं दुनिया ताल से ताल 

जिसको जैसे करने है, करे वैसे सवाल

अब नहीं रंगवाउंगी मैं अपने सफ़ेद बाल!!


Sapna..