मेरे जनम पे आज भी
कई घरों में चिंता होती
भाई के आने पे खुशियाँ
मेरे आने की खबर भी नहीं
आज भी रास्तों पे मैं
बेखौफ निकल नहीं सकती
खुले घूमते भूखे भेड़िये
पैरों में मेरे बेड़ियाँ होती
शादी की रसमों के बाद
मेरी ही क्यों बिदाई होती
घर में सब है एक सामान
तो मैं ही क्यों सर ढकती
खाना बनाऊ, बच्चे संभालु
यही अपेक्षा मुझसे होती
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले
इच्छाओं का मैं गला घोटती
मैं भी पढ़ना चाहती हूँ
सपने देख बढ़ना चाहती हूँ
मांगू नहीं खैरात कोई
मेहनत से पाना चाहती हूँ
नाम कमाना चाहती हूँ
गर्व कराना चाहती हूँ
अब रक्षा करवाना नहीं
मैं रक्षा करना चाहती हूँ
राहें चुननी है मुझे नई
अब होने है बदलाव कई
अभी तो हूँ कैद में ही
मैं अभी आज़ाद नहीं..
Sapna..
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