Tuesday, July 11, 2023

अब भी..

कानो में आवाज़ अब भी गूंजती है तुम्हारी..

जब तुम मुझे दिलासा दिया करती

जब 'ऐसे नहीं रोया करते बेटा' ये कहा करती

जब 'घर कब आओगी?' ये पूछती


आँखों में वो पल अब भी कैद से है..

जब तुम चाय की चुस्किया लिया करती

जब मेरे आने पे खुश हुआ करती

जब पापा को छेड़ा करती


तुम्हारे हाथों की छुअन अब भी मौजूद सी है..

जब तुम हमें आशीर्वाद दिया करती

जब बच्चो से जी भर के लाड लड़ाती

जब प्यार से बालों को सहलाती


स्वाद अब भी तुम्हारे हाथों का, याद सा है..

जब सर्दियों में बादाम का दूध बनाती

जब ख़ास हमारे लिए उड़द चक्की बनाती

जब ढेर सारे घी वाला सीरा बनाती


रंग वो अब भी ताज़ा से है..

जब तुम होली पे रंग लगाती

जब त्योहारों पे नए कपड़ो में सजती

जब अपनी अलमारी की साड़ियां दिखाती


उमंग वो अब भी बिखरी सी है..

जब कही बाहर घूमने को जाते

जब कोई मेहमान घर में आते

जब तुम ढोल की आवाज़ पे नाचती


नहीं है तो बस एक चीज़..

तुम्हारे बिना जीने का तजुर्बा

की वो कभी हमें आया ही नहीं

तुम्हे खुदसे दूर कभी पाया ही नहीं..


Sapna..

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