Thursday, February 8, 2024

किताबों के शहर...

आज घूमने निकली हूँ मैं

किताबों के शहर

कविताओं के यहाँ पुल है

कल्पनाओं से है घर


शब्दों के ऊँचे पहाड़ों के बीच से 

बह रही विचारों की नहर

रंग- बिरंगे, उदास और खुशमिज़ाज

उसमे समाये ऐसे कई पत्थर


बहती रही वो बलखाती हुई

मोड़ और रुकावट की उसे क्या फ़िकर 

चली मैं उसके पीछे पीछे

पहुंची रचनाओं के समंदर


बिखरे है कई शब्द किनारे पे

भावनाओं से भरी हर लहर

गोते लगाए जब विशालता में

पड़ी एक नए अस्तित्व पर नज़र 


इसी तरह गुज़रे रातें मेरी

यही शुरू हो हर एक सहर

खोलू मन की खिड़की जब भी

सामने हो कहानियों का महासागर!!


Sapna..

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