Monday, August 19, 2024

एक आँसू...

मैं रोती नहीं आसानी से

पर पीड़ा उसकी सोच के

एक आँसू मेरा टपक गया 


जब अकेले, बेसहारा जान के

दरिंदे उस पर टूट पड़े

उसकी दहशत के ख़याल से

हर जर्रा मेरा सिहर गया


उसकी जीने की चाह को

भूखे भेड़िए रोंधते गए

उसके संघर्ष की कल्पना से

खून का हर क़तरा उबल गया


शीशे से चीरा तन को 

जिस्म के हिस्से तोड़े गए

चीखें उसकी कानों में गूंजी

एहसास रूह को झकझोर गया


किस उत्साह से डॉक्टर बानी वो 

उसका अंत हुआ किस हैवानियत से

हर वृत्तांत को पढ़के - सुनके

अस्तित्व टूटके बिखर गया


आँसू बेबाक टपक टपक के

सैलाब में तब्दील होते गए

एक लड़की होने के सच में 

हर अन्याय का बोझ सिमट गया


Sapna..


No comments:

Post a Comment