चले थे कही से
कही को जाने के लिए
कुछ मंज़िल के करीब हुए
कुछ रास्ते ही भूल गए
हम तनहा तनहा थे यही
कभी काफिलों संग हो लिए
कही अंजानो से कारवां जुड़े
कही अपनों के साथ छूट गए
कुछ हमने खुदको कोसा था
कुछ औरों की कमियाँ निकाली थी
कभी काटे भी चाभते न थे
कही फूलों से भी ज़ख्म हुए
कुछ कसमें हमने खाई थी
कुछ वादों पे ऐतबार किया
कही बेगाने भी ख़ास हुए
कही खून के नाते टूट गए
कही ख्वाब मुक्कमल हो गए
कभी पलकों से नींदें रूठ गई
कही पीड़ में एक आह भी न निकली
कभी ख़ुशी में आंसू फूट पड़े
चले थे कही से अकेले
कही पहुंचने के लिए
कुछ दुआओं का साया रहा
कुछ उपरवाले के रहम हुए
Sapna..
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