मैं फ़र्ज़ निभाती गई, तकलीफ सहते हुए
वो दर्द दिखाते रहे, मौज करते हुए
मैं सर झुकाती रही, मान देते हुए
वो बेइज़्ज़ती करते रहे, मज़े लेते हुए
मैं प्यार लुटाती रही, सबको सहेजते हुए
वो नफरत उगलते रहे, मुझे तोड़ते हुए
मैं ख़ुशी न्योछावर करती रही, दुखी होते हुए
वो और ऊंचे होते रहे, मुझे कुचलते हुए
मैं ग़लत ठहराई गई, सही होते हुए
वो सही समझे गए, चालबाज़ होते हुए
मैं खुद ही को कोसती रही, नेकदिल होते हुए
वो नीचे ही नीचे गिरते रहे, इंसान होते हुए
मैं मौन ही रहने लगी, ज़बान होते हुए
वो ग़लतियाँ ही देखते रहे, आँखें होते हुए
मैं पूरी तरह हार गई, घायल होते हुए
वो ताने ही कस्ते रहे, घमंडी होते हुए
अब मैं हताश हो गई, यह बोझ ढ़ोते हुए
और भरोसा करना छोड़ चुकी, निराश होते हुए
क्योंकी मैंने देखा है,
सेवा करती बहु को ज़लील होते हुए
और ज़लील करती बहु की पूजा होते हुए
Sapna..
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