रोज़ाना के 3 बजे
ना वो फ़ोन की घंटी का बजना
अब वो दोपहर में दिन भर की बातें नहीं होती
ना मैं उनकी शिकायत करती हूँ
ना वो अपने जमाईसा की तरफदारी
अब वो बेवजह की तकरार नहीं होती
ना पापा की ख़ामोशी का गिला
ना 'क्या हुआ, मुझे बताओ' से दिल रखना
अब वो मन हल्का करने की पहल नहीं होती
ना 'बड़े दिन हो गए, मिलने आजा' की फ़रियाद
ना 'माँ, आज नहीं हो पायेगा' कहके बहलाना
अब वो मिलने का सिलसिला नहीं होता
ना मायके जाने पर माँ के आँखों में चमक
ना घर में बिखरती उनकी ख़ुशी की खनक
अब वो छुट्टियों का इंतज़ार नहीं होता
ना गोद में चैन से सर रखना
ना बूढी कोमल उँगलियों का बालों को सहलाना
अब वो सुकून से आराम नहीं होता
ना मन पसंद चीज़ों की फरमाइश
ना 'अभी बना देती हूँ' की फुर्ती
अब वो बच्चों को सर चढ़ाना नहीं होता
ना नाती, पोती का आगे पीछे फुदकना
ना उनका बच्चों के साथ नाचना - खेलना
अब वो 'नानी तेरी मोरनी' वाली धुन नहीं बजती
ना जमाईसा को लाड से खिलाना
ना बच्चों को प्यार से पुचकारना
अब वो 'तू बस अपना ख्याल रख' सुनना नहीं होता
ना अलमारी के किसी कोने से तोहफे का निकलना
ना लौटते वक़्त पैसे देने पर माँ से लड़ना
अब वो 'मैं हूँ तब तक दूंगी' वाला ब्लैकमेल नहीं होता
रोज़ाना दोपहर के 3 बजे
ना फ़ोन की घंटी का बजना
अब वो 'माँ calling' screen पर देखना नहीं होता
Sapna..
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