मुझे तुमसे नाराज़ होने का तो हक़ है
पर तुमसे ये आस लगाए रखना की
'तुम मुझे मनाओगे', कुछ हद तक ठीक है
पर 'तुम मुझे समझोगे'
हर बार, हर परिथिति में,
ये सरासर ज़ुल्म होगा...
शायद जब मैं तुमसे मेरा हाल पूछने की आस लगाए हूँ,
तुम मुझे मेरे हाल पे छोड़ना चाहते हो.
जब मैं तुमसे बातें सुनना चाहती हूँ,
शायद तुम मुझे अपनी बातों से परेशान नहीं करना चाहते.
जब मैं तुमसे मेरे लिए कुछ वक़्त चाहती हूँ,
तुम शायद मुझे खुदके साथ वक़्त बिताते देखना चाहते हो.
जब मैं तुमसे अपनी ज़िन्दगी, अपने वजूद की एहमियत पूछती हूँ,
शायद तुम मुझे खुद की कीमत महसूस कराना चाहते हो.
जब मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करने की जत्तोजेहेत करती हूँ,
तुम शायद मुझे कुछ ना करने का सुकून देना चाहते हो.
जब मैं तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ,
तब शायद तुम मेरा इंतज़ार कर रहे होते हो...
इनमे से कई शायद
और ऐसे बहुत से और शायद सच भी है
इन सब परिस्थितियों में हमारा रिश्ता
'आशा और निराशा' के बीच झूल रहा होता है
अनसुनी आशा, अनकही निराशा..
लेकिन
क्या हमारे माता पिता के अलावा
हमारी अनकही कोई सुन सकता है?
किसीके मन का हाल जानना,
उनकी बातें बिन बोले समझना
क्या रिश्तों को भारी नहीं बना देता?
क्या समाज, रीति- रिवाज़ों
और ज़िम्मेदरियों का बोझ काफी नहीं
जो हम अपने रिश्तों पर और बोझ लादना चाहते है?
हम क्यों नहीं अपने मन की बात खुद ही कह देते?
क्यों हम अपने प्यार, अपनी ख़ुशी के लिए
खुद पहल नहीं करते?
ऐसा तो नहीं की मांगी हुई खुशियां हमारी नहीं होती
बल्कि वो खुशियां और एहम होती है
जिनके लिए हम खुद कोशिश करते है..
तो मैं अब भी तुमसे नाराज़गी जताऊँगी
पर जो तुम मुझे ना मना पाओ,
तो तुम्हे मनाने का नुस्खा भी बता दूंगी
तुम मुझे समझ ना पाओ,
तो समझाने की कोशिश करुँगी
क्यूँकि शायद मैं अब समझ रही हूँ
की ये ज़िन्दगी एक तोहफा है
इसका लुत्फ़ उठाने बस तुम मेरे साथ रहना...
Sapna..
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