वाह रे ज़िन्दगी!
कितनी शानदार है तू,
और कितनी कंजूस भी.
कितनी खुशमिज़ाज है तू,
और कितनी संजीदा भी..
प्यार से कभी किसी को
कुछ सीखाना तो तुझे आया ही नहीं.
पर तेरे थपेड़ो से ऐसी सीख मिली
कि खानेवाला कभी भूल पाया ही नहीं.
मैं भी उन्ही में से तो एक हूँ
जिसके पास सब कुछ रहते
मज़े से ज़िन्दगी जिया करती.
मुझे ये एहसास था की
जो तूने मुझे दिया है, वो कईओ के पास नहीं
कभी तेरे दिए पे ना शक किया,
न तेरे ना देने पे मायूसी जताई.
'जो होता है अच्छे के लिए होता है',
ये समझ के तुझे पलकों पे बिठाये रखा.
पर कहा जानती थी
कि जिन चीज़ों के लिए शुक्रगुज़ार हूँ,
उसका तो हिसाब तू करती ही नहीं.
तू तो उन अनमोल लोगो पर नज़र गड़ाए बैठी है,
जिनके बिना हम कुछ भी नहीं
और पल भर में
हमारे तिलिस्म के घेरे से छुड़ाकर
तू उन्हें उड़ा ले जाती है..
जैसे पहले उनके बिना कुछ होता नहीं,
वैसे ही, उनके बाद भी कुछ नहीं होता..
जैसे किसी बच्चे के लिए
उसके बचपन से ज़्यादा मोल
किसी खिलोने का होता है
वैसे ही हम बेवक़ूफ़, ज़िन्दगी से ज़्यादा मोल
साधनो को देने में समय बिता देते है.
और फिर तेरे एक थपेडे से
जैसे नींद जाग जाती है.
वाह रे ज़िन्दगी!
कितना देती है तू,
और कितना छीनती भी.
कितना हँसाती है तू,
और कितना रुलाती भी...
Sapna..
No comments:
Post a Comment