वो कई सालों से उसी जगह खड़ा था
ना जाने कितने सालों से
न उसे किसीने जन्म लेते देखा
न बढ़ते हुए, न बूढा होते हुए
धूप, छाओं, बारिश, हवाएँ,
नहीं डगमगाया किसी परिस्थिति में
आज न जाने कौनसी क़यामत
छोड़ गई उसे इस स्थिति में
चल रही है बेदर्द आरियाँ
बदन बिखरा पड़ा टुकड़ो में
कल तक जो हरा भरा जीवन सा था
अब गिना जाएगा मुर्दों में
स्वार्थियों के साथ जिया
शायद इसी जुर्म की सज़ा है ये
आरसे से संभाले रखा जिसने
कोई न आगे आया उसे संभालने
जब मायने ही न रहे जीने के
कर दिया खुदको तूफान के हवाले
और मूँद ली आँखें ये सोचके
की वक़्त हो चला, अब चलते है..
Sapna...
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