मैंने देखा था उसे
रहता था वो यही कही
छोटी सी उम्र थी मगर
बड़े सपनो की कोई कमी नहीं
साइकिल गिर गिर के चलाता
कंचो को खज़ाना बताता
पतंगबाज़ी में रोमांच ढूंढता
चोंटों का कभी कोई ज़िक्र ही नहीं
पापा की डाट से तो डरता
पर उनका सर गर्व से ऊंचा करना चाहता
माँ की गोद, रोटी, दाल चावल
इन्ही में लगता सब कुछ सही
दोस्तों के कन्धों पर हाथ डाले निकलता
नए नए खेलो की तलाश रहती
हर किसीका चाहे वो दोस्त बन जाता
पर हर कोई उसका दोस्त नहीं
Half pant से full pant पे आना
छोटी छोटी सी मूछो का निकलना
अपनी आवाज़ का भारी होना
उसके बदलावों पे ध्यान कोई देता नहीं
बहन की रक्षा का ज़िम्मा उठता
माँ - बाप के बुढ़ापे का सहारा कहलाता
परिवार को चिराग बनके रोशन करता
भुला देता है खुदके सपने वही
वो बड़ी गाडी की ख्वाहिश
वो दुनिया देखने का शौक
वो बेबाक बेपरवाह सी ज़िन्दगी
दब गई ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कही
वो भीड़ में घुलने की कोशिश न करता
कई बार फ़र्ज़ पे प्यार वार देता
कोई ठहर के उसे नहीं पूछता
की कही उसकी मंज़िल कुछ और तो नहीं
मैंने देखा था उसे
रहता था वो यही कही
पापा, भाई, दोस्त, पति में ढूंढो
शायद उनमे वो मिल जाए कही..
Sapna..
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