Saturday, April 9, 2022

स्वर्ग बनाये...

सज धज के बैंड बाजे लेके

घर किसी और के आके  

हाथ जोड़के हम अपनी

घर की लक्ष्मी ले जाते 


उसका पहनावा बदलते

रहने सहने का ढंग बदलते

ज़ोर ज़ोर से हम हस्ते

क्यों वो धीमी आवाज़ में मुस्काये? 


बेटी को हम आज़ाद बनाते

बहू को घूँघट में गुड़िया बनाते

बेटों को आत्मा निर्भर बनके

क्यों बहू को घर में ताला लगते? 


वो भी तो हम जैसी है

ये ही हम भूल जाते

ससुराल की नाक वो ऊंची रखे

तो हम उसे क्यों नीचे दिखते?


अपनी ज़िन्दगी को लेके

उसके भी कुछ अरमान है

चूल्हे बच्चों और घर के परे

क्या उसकी कोई पहचान नहीं? 


बेशक वो बेटी है पराई

अपनों को वो छोड़ के आई

अपनी इज़्ज़त की आड़ में

उसकी खुशियां क्यों जाए? 


रहने दे उसे जैसी वो है

उसका भी मान बढ़ाए

बहू और बेटी के अलग रंगो से

क्यों ना आँगन रंगीन बनाए? 


वक़्त है अब बदलने का

बहुओं के ढंग में ढलने का

हम जैसे बनके वो बूढी ना हो

क्यों ना हम उन जैसे जवान हो जाए?


आज हम सब नाचते गाते

नए सदस्य को लेके जाए

उसे खुशियों की कमी ना हो

क्यों ना उसके लिए घर स्वर्ग बनाये??


Sapna...

No comments:

Post a Comment