मैं रोना चाहती हूँ
नहीं...
पर अब नहीं
पापा की हिम्मत टूटने नहीं देनी है
दीदी का सहारा भी तो बनना है
कल जी भर के रो लुंगी...
(अगले दिन..)
अरे आज तो सारा परिवार यहाँ है
आज माँ को अलविदा कहना है
भाई और भाभी से माफ़ी मांगनी है
उनको दिया हुआ वादा जो नहीं निभा पाए
अब उनसे नज़रे कैसे मिला पाएंगे
इतना तो कर सकते है
की उनके सामने नही रोयेंगे
(2 दिन बाद..)
रेल गाडी और हवाई जहाज में
अनजान लोग बहुत है
बेवजह सब घूरेंगे
यहाँ नहीं रोना है
(कुछ दिन बाद..)
कुछ दिन यहाँ रुक के,
ज़िन्दगी को सामान्य करने की कोशिश करेंगे
आज बेटा मिलने आया है
भांजा और भतीजी भी हमें ताकते है
हमारे बच्चे कुतूहल और अचंभे से देखते है
कौन है ये इतने सारे लोग?
क्यों आते है रोज़ घर पे इतने लोग?
इन बच्चों के सामने रोना क्या ठीक होगा?
नहीं नहीं..
मैं घर जाके सिर्फ उनके सामने रोउंगी..
वो मेरी बातें सुनेंगे, मुझे सहारा देंगे
मेरी मनोदशा समझेंगे
हाँ...
उनके सामने रोने में क्या हर्ज़?
घर आके उन्हें देखा
पर वो तो ज़िन्दगी की दौड़ में व्यस्त है
उनके काम में दखल कैसे दिया जाए?
तो तय हुआ की
उनके दफ्तर जाने के बाद रोया जाए...
अकेले में जब खुद से मिली,
रोने की बहुत कोशिश की
ना पलके भीगी, ना आंसू आये,
शायद आंसू सूख गए होंगे..
दिन भर अपना काम करके
अंत में प्रार्थना करके
बिस्तर पे लेटी,
आँखें बंद की,
माँ को देखा,
और एकाएक आंसुओं की बौछार शुरू हो गई
शायद उन्हें मुझसे एकांत में रूबरू होना था
जब हम दोनों की बातें रोकने वाला कोई ना हो..
उनकी बातें मैं घंटों सुनती रही
और ये आँखें बिना थके रोती रही...
Sapna..
No comments:
Post a Comment