Tuesday, April 16, 2024

शारीरिक रूह...

मेरी रूह शारीरिक है

मैं उसे महज़ महसूस नहीं कर सकती 

बल्कि

उसे छू सकती हूँ 


वह मुझे कभी

कभी अत्यंत सराहनीय लगती है

और कभी

मैं उसे मिटा देना चाहती हूँ


मेरा लेखन

मेरे शरीर कि रूह सा है

वह मेरे अंत के बाद

कही भटकेगी नहीं

वह मेरी किताब में

छुपी बैठी मिलेगा


किताब के खुलते ही

जैसे शब्द रिहा होते है

मेरे लिखे में

मेरी रूह आज़ाद उड़ती रहेगी

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