अस्तित्व के किनारे पर
अच्छी - बुरी आदतें
कभी निडर, कभी घबराए
हंसती - रोती बातों किया करती है
लम्हे महीन रेत से
यहाँ वहाँ खेलते कूदते रहते है
कुछ खुशियों की लहरें
दुःख को धो देती है
तो कुछ उम्मीदें ऊंची ऊंची
हिलोरे लगा लिया करती है
जीवन बस इन सबमें
गोते लगाने में व्यस्त रहता
और मौत एक सैलाब सा
सारा सही और गलत बहा ले जाती है
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