Saturday, April 13, 2024

मैं और मेरा लिखना..

मैं और मेरा लिखना

आँख मिचोली खेलते है एक दुसरे से


जब वो मेरे पास आए तो मैं व्यस्त होती हूँ

जब मैं उसे ढूँढू वो कही छुप जाता है


जब कोई ख़याल मन में आता है

शब्द मेरे गुम हो जाते है


कोई पंक्तियाँ मन सोच पाता है

हाथों को लिखने का वक़्त नहीं मिल पाता है


इत्मिनान से लिखने बेठू कभी

तो ख्याल छोटे बच्चो से उथल पुथल मचाते है


अपने लेखन को टटोलने लगती हूँ

तो वो मुझसे रूठ सा जाता है 

मिन्नतें करू पर वो मुँह चढ़ाए उकडू बैठ जाता है

उसे मानाने की कोशिश नाकाम होते देख 

"फिर तुझे कभी नहीं टालूंगी" का झूठा वादा करना पड़ता है


मुस्कुराकर वो मुझसे लिपट जाता है

फिर हम दोनों शब्दों की डोर से बंधे

ख़ुशी के गुब्बारे में साथ साथ उड़ जाते है..


Sapna..

No comments:

Post a Comment