सारा घर भरा हुआ था
उसके आने के इंतज़ार में
अनदेखा सा माहौल था
हलचल सी थी परिवार में
कुछ लम्हे थम से गए थे
कुछ बिखरे थे आँगन में कही
कई किस्से किसीको याद से आते
कही यादें दिलों में दस्तक देती
वो आई जिसके लिए पलके थी बिछी
उसके होने पर हर नज़र खींची चली
लाल लहंगा, गोटेदार चूनर
आँखों में काजल, माथे पे बिंदी
होठों पे लाली, हथेली पे मेहेंदी
माथे पे बोर, हाथों में चूड़ी
सुंदरता में कसार न रही कोई
बहन, भाभी और लड़कियाँ
उसे सबने मिलके सजाया
सामने आए पतिदेव, भरी उसकी मांग
और बच्चों ने ओढ़ाई उसे, उसकी पसंदीदा शॉल
उठाए उसे बड़े नाज़ों से
लेकर निकले देहलीज़ के पार
कंधे थे वही चार
लेकिन वो थी नई यात्रा के लिए सवार
भोर वो औरों के लिए उजाली रही होगी
उसके परिवार की आज अँधेरी सुबह थी
जब भाई, बेहेन अपनी बेहेन को
जब उसके पति, अपनी संगिनी को
उसके बच्चे अपनी माँ को
उसके नवासे और पोती अपनी नानी/दादी को
और आए हुए लोग, एक बेहद भले इंसान को
अलविदा कहने इकठ्ठा हुए थे
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