Sunday, April 14, 2024

अँधेरी सुबह

सारा घर भरा हुआ था

उसके आने के इंतज़ार में

अनदेखा सा माहौल था 

हलचल सी थी परिवार में


कुछ लम्हे थम से गए थे

कुछ बिखरे थे आँगन में कही

कई किस्से किसीको याद से आते

कही यादें दिलों में दस्तक देती


वो आई जिसके लिए पलके थी बिछी

उसके होने पर हर नज़र खींची चली


लाल लहंगा, गोटेदार चूनर

आँखों में काजल, माथे पे बिंदी 

होठों पे लाली, हथेली पे मेहेंदी

माथे पे बोर, हाथों में चूड़ी

सुंदरता में कसार न रही कोई


बहन, भाभी और लड़कियाँ

उसे सबने मिलके सजाया

सामने आए पतिदेव, भरी उसकी मांग

और बच्चों ने ओढ़ाई उसे, उसकी पसंदीदा शॉल

उठाए उसे बड़े नाज़ों से

लेकर निकले देहलीज़ के पार

कंधे थे वही चार

लेकिन वो थी नई यात्रा के लिए सवार


भोर वो औरों के लिए उजाली रही होगी

उसके परिवार की आज अँधेरी सुबह थी

जब भाई, बेहेन अपनी बेहेन को

जब उसके पति, अपनी संगिनी को

उसके बच्चे अपनी माँ को

उसके नवासे और पोती अपनी नानी/दादी को

और आए हुए लोग, एक बेहद भले इंसान को

अलविदा कहने इकठ्ठा हुए थे

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