तुम्हे बुलाकर पलट जाऊ
तो कैसा रहे?
आवाज़ देकर मुकर जाऊ
तो कैसा रहे?
रहे नहीं अब दोस्त या हमकदम तुम
मैं फिर भी तुम्हे गैर ना बताऊ
तो कैसा रहे?
तुम्हारी बेरुखी ना बताऊ
तो कैसा रहे ?
तुम्हारी संगदिली ना जताऊ
तो कैसा रहे ?
तुम्हारी याद में आँसू बेहिसाब बहे
मैं फिर भी तुम्हे देखकर मुस्कुराऊ
तो कैसा रहे?
तुम्हारी दी चोटे ना दिखाऊ
तो कैसा रहे?
तुम्हारे दिए ज़ख़्म तुमसे छिपाऊं
तो कैसा रहे?
मेरे घाव की परवाह तुमने की नहीं
मैं फिर भी तुन्हे मरहम लगाऊ
तो कैसा रहे?
तुम्हारे सपनो में आकर जगाऊ
तो कैसा रहे ?
जैसे तुमने सताया, वैसे सताऊ
तो कैसा रहे?
मेरी नींदें तो तुमने उड़ा ही दी
मैं तुम्हे चैन की नींद सुलाऊ
तो कैसा रहे?
Sapna..
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