मुझे, मेरे जैसी मैं,
हर किसीमें दिखने लगी है
आईने के सामने खड़ी
खुद की सुंदरता निहारती मैं
अपने चेहरे, अपने शरीर की
बनावट पर संदेह करती मैं
रोज़ घर पर रुक कर
परिवार का ख्याल रखती मैं
ज़रूरत पड़ी तो देहलीज़ लाँघकर
रोटी कमाने बाहर निकलती मैं
कही कोशिश करने से,
पहला कदम बढ़ाने से डरती मैं
किसी कामयाबी के शिखर पर
सबको साथ लेकर चलती मैं
कभी अपनों की ख़ुशी के लिए
चुप - चाप सहती मैं
कभी अपनी आवाज़ पहचानकर
बग़ावत पर उतरती मैं
कही कैद में
आज़ादी के सपने बुनती मैं
कही उम्मीद की किरण बनकर
राह को रोशन करती मैं
किसी कहानी की किरदार बने
अभिनय करती मैं
कई कहानियों को रूप देती
रचइता, निर्देशक मैं
मुझे, मेरे जैसी मैं,
हर किसी में
जनम लेती, बढ़ती दिखती है
इस कविता को लिखती,
लिखी जा रही मैं
इसी के माध्यम से
नया अस्तित्व पाती मैं
Sapna..
No comments:
Post a Comment