Wednesday, June 12, 2024

मेरी खिड़की के बाहर..

 लहलहाते पेड़ों की डालियाँ थी 

महकती फूलों की क्यारी सुहानी

कूदती फुदकती गिलहरियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


बच्चों की किलकारियाँ थी

स्कूल की चहलपहल बचकानी

भोली भाली बेदाग़ यारियाँ थी

मेरी खिड़की के बाहर


मिलते - जुलते लोग थे

बाँटा करते अपनी परेशानी

बातों बातों में बनते संयोग थे

मेरी खिड़की के बाहर


एक ज़माना बीत गया है

खुशनुमा सी थी तस्वीर पुरानी

अब मंज़र ही बदल गया है

मेरी खिड़की के बाहर


गिरते - कटते वृक्ष है

बेजुबानो के उजड़ते आशियाने

बिगड़ रहा प्रकृति का अक्स है

मेरी खिड़की के बाहर


भक्षक बानी इंसानियत है

खौफ में बचपन की कहानी 

दम तोड़ रही मासूमियत है

मेरी खिड़की के बाहर 


वाहनों की आवाजाही है

दिन - ब - दिन बढ़ती ध्वनी

डिब्बों में कैद आज़ादी है

मेरी खिड़की के बाहर


ऊंचे - ऊंचे से मकान है

उनमें अजनबियों की रवानी

सबमें झलकती एक थकान है

मेरी खिड़की के बाहर


अंतरजाल से बुना जीवन है

सुविधा से हार रही सावधानी

शोर में चीखता अकेलापन है

मेरी खिड़की के बहार


गरीब की हालत पस्त है

जान, ईमान या हो जवानी

हर खरीद का बंदोबस्त है

मेरी खिड़की के बाहर


हर पल बढ़ती प्यास है

और सूखता जा रहा पानी

जाने कैसे कल की आस है

मेरी खिड़की के बाहर


Sapna..

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