यूँ ही कैसे गुज़र गयी तू ऐ ज़िन्दगी
हमने ठीक से तुझे जिया ही नहीं
जज़्बातों की चाबी तेरे हवाले
तू ही खोले ख़ुशियों के ताले
हाथों से इतनी जल्दी क्यूँ फिसले
हमने महसूस कुछ किया ही नहीं
प्यार भरा हर दिल में यहाँ
उसने यहाँ बड़ा दर्द भी सहा
चोट को खुला छोड़ गई कहाँ
हमने ज़ख्म अपना सिया ही नहीं
ताकत को यहाँ बहुत गुरूर
सबको है बुलंदी का सुरूर
कामयाबी से अब कर ना दूर
हमने इस मै का घूँट पिया ही नहीं
सुबह की धूप सी गुनगुनी
छोटे छोटे लम्हो से तू बुनी
हज़ारों बार कही और सुनी
अफ़सोस के फिर भी...
हमने जी भर के जिया ही नहीं
यूँ ही कैसे गुज़र गयी तू ऐ ज़िन्दगी
हमने ठीक से तुझे जिया ही नहीं...
Sapna..
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