Tuesday, April 7, 2020

आसमान...

सन्नाटे भरी शाम थी 
रास्तों पे ना किसीका साया
हवाएँ करवटें ले रही
जैसे कोई चैन कि नींद सोया

अचानक बड़ी हलचल सी हुई
प्रकृति को झपकी से जगाया
शांत रहे से माहौल में
संपूर्ण अस्थिरता का बीज बोया 

बादलों कि गड़गड़ाहट हुई
उनका तो जैसे जी हल्का हुआ
सौम्य सी भाप से भर भर के
तूफ़ान का बोझ अब तक था ढोया

जिन्हे रौशनी कि आदत लगी थी 
उन आँखों को अंधेरों से मिलाया
डराती सी कड़कती बिजलियों ने
रात को चमक में डुबोया

प्यासी धरती पर बूंदें गिरी
अमृत जल को जी भरके पिया
धूप में खड़े खड़े तप रहे
पेड़ों को बड़े प्यार से भिगोया

जिन रूखे जिस्मों कि थी एकाकी
उन्हें नमी का एहसास दिलाया
दर्द की धूप में झुलसी पड़ी 
अनगिनत आत्माओं को धोया

जाने उसका दिल फूला ख़ुशी से 
या अम्बर का जैसे जी भर आया
अरसे बाद ऐसी बरसात हुई 
आज आसमान जैसे खुल के रोया


Sapna.. 

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