खिड़की पर खड़े हुए मैंने एक दृश्य देखा
एक छोटा बच्चा अपनी माँ की ऊँगली थामे चल रहा था
और ठीक सामने से एक आदमी अपने फ़ोन में मगन जा रहा था
दोनों एक दुसरे के सामने से गुज़रे
ना बच्चे ने आदमी को देखा
ना उस आदमी ने बच्चे को
कुछ सालों बाद ये भूमिकाएं उलट जायेगी
जब बच्चा बड़ा होकर फ़ोन में मगन रहेगा
और वह आदमी किसी बच्चे को देखके खुश हुआ करेगा
इस फेर बदल के अंतराल में कितना कुछ बीत चूका होगा
कितना कुछ पाया होगा, कितना कुछ खोया होगा,
फिर कुछ समय बाद वह बच्चा जो आदमी बना,
वह भी किसी बच्चे में ही अपनी ख़ुशी पायेगा
और ये चलता ही जाएगा
Sapna...
No comments:
Post a Comment