एक वक़्त था जब मैं आपसे घंटो बातें किया करती
उन इधर-उधर की बातों में वक़्त का पता ही नहीं चलता
अब जो वैसा कुछ हो नहीं सकता
मैं अपने आपको किसी भिखारी सी लगती हूँ
मेरे लिए कटोरा मेरा फ़ोन है
जिसमे आपसे बात करने का मौका, सिक्को जैसा है
आपकी आवाज़ उन सिक्को की खनक सी है
इस उम्मीद में की कोई तो मुझसे बात करेगा
मैं फ़ोन लगाना शुरू करती हूँ
पर कोई मुझसे कुछ मिनटो से ज़्यादा बात नहीं करता
शायद उन्हें मेरी उस तरह याद नहीं आती,
जिस तरह आपको आती थी
शायद किसीको मेरी बातें सुनने में,
वो आनंद ना आया जो आपको आता था
शायद उन्हें मुझसे वो लगाव नहीं,
जो आपको मुझसे था.
ये 'था' लिखने में तो बड़ा आसान है
मगर इसे मानना, विश्वास करना बड़ा मुश्किल
ना जाने कब मैं इस 'था' को अपनाऊँ
फिलहाल तो मैं एक हताश, निराश भिखारी जैसे
बस अपने फ़ोन को घूरा करती हूँ...
Sapna..
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